प्रो. विधु रावल
इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी राष्ट्र की आत्मा सदियों की निद्रा और हीनभावना से जागकर अपने पुनरुत्थान के मार्ग पर आगे बढ़ती है, तब-तब उस मार्ग को रोकने के लिए विनाशकारी शक्तियां अपने पूरे वेग के साथ सक्रिय हो जाती हैं। भारत के समकालीन इतिहास में राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के महानायक नरेंद्र मोदी महज़ एक राजनेता नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की उस सामूहिक चेतना और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन चुके हैं, जिसे मिटाने के लिए सरहद के पार और सरहद के भीतर बैठे विरोधियों ने साज़िशों के अनगिनत जाल बुने। लेकिन सनातन परंपरा का एक शाश्वत सत्य है-‘जाको राखे साइयां, मार सके न कोय’। जिस प्रकार हिरण्यकश्यप के लाख क्रूर प्रयासों के बाद भी बालक प्रह्लाद का बाल बांका नहीं हुआ, उसी प्रकार मां भारती के इस अनन्य उपासक की रक्षा स्वयं देश की कोटि-कोटि जनता की प्रार्थनाओं और नियति के अभेद्य कवच ने की है।
27 अक्टूबर 2013 का वह रक्तरंजित अध्याय
आज से ठीक 13 वर्ष पूर्व, 27 अक्टूबर 2013 को बिहार की ऐतिहासिक धरती पटना का हुंकार मैदान भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे बड़े जनसैलाब का गवाह बना था। देश के भावी प्रधानमंत्री को सुनने के लिए इंसानों का एक समंदर उमड़ पड़ा था। लेकिन इसी विशाल जनसमूह के बीच ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ के बर्बर जिहादी आतंकियों ने इस समंदर को श्मशान में बदलने की खौफनाक साज़िश रची थी। मैदान में एक के बाद एक सात बम धमाके हुए। धुएं के गुबार के बीच चीख-पुकार मची, छह निर्दोष देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी और दर्जनों घायल हो गए। मंच के ठीक नीचे भी एक टाइम बम जीवित था।
ऐसी भयावह परिस्थिति में जहां कोई भी व्यक्ति आत्मरक्षा के लिए भाग खड़ा होता, नरेंद्र मोदी अडिग रहे। वे मंच पर डटे रहे और उन्होंने अत्यंत शांतचित्त होकर जनता से शांति बनाए रखने और संयम बरतने की भावुक अपील की। यदि उस क्षण उस महानायक ने धैर्य खो दिया होता, तो वहां मची भगदड़ में हज़ारों मासूमों की जान चली जाती। वह केवल एक आतंकी हमला नहीं था, बल्कि साक्षात मृत्यु का सामना था, जिससे वे भारत माता की रक्षा के संकल्प के कारण सकुशल बाहर निकल आए।
लाल चौक की ललकार से लेकर इशरत जहां के षड्यंत्र तक
यह पहली बार नहीं था जब मौत ने उन्हें छूकर गुज़रने की कोशिश की। याद कीजिए 1992 का वह दौर, जब कश्मीर घाटी में आतंकवाद अपने चरम पर था, चारों ओर गोलियां चल रही थीं और भारतीय ध्वज को अपवित्र करने की धमकियां दी जा रही थीं। तब सभी सुरक्षा एजेंसियों और शुभचिंतकों ने उन्हें वहां न जाने की सलाह दी थी। लेकिन राष्ट्रभक्ति के जज़्बे से सराबोर उस राष्ट्रपुत्र ने जान की परवाह न करते हुए श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराया। उसी दिन कश्मीर से आतंकवाद की रीढ़ टूटने की शुरुआत हुई और घाटी पर भारत की संप्रभुता का उद्घोष हुआ।
इसके बाद देश के भीतर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त आतंकवाद का सबसे घिनौना चेहरा सामने आया, जब लश्कर-ए-तैयबा ने इशरत जहां और उसके सहयोगियों के माध्यम से मोदी की हत्या का ब्लूप्रिंट तैयार किया। सत्ता के गलियारों में बैठे कुछ रसूखदारों का वरदहस्त इस साज़िश को प्राप्त था, जहां जांच एजेंसियों और संवैधानिक संस्थाओं तक को कमज़ोर करने का प्रयास किया गया। लेकिन गुजरात पुलिस के वीर जवानों और आईबी अधिकारी राजेंद्र कुमार की कर्तव्यनिष्ठा ने उस जिहादी साज़िश को नाकाम कर दिया। विडंबना देखिए कि देश के लिए जान जोखिम में डालने वाले इन सुरक्षाबलों को सम्मानित करने के बजाय, तत्कालीन सत्ताधीशों ने तुष्टिकरण की राजनीति में अंधा होकर आतंकियों के नाम पर एम्बुलेंस चलाईं और उन्हें ‘बिहार की बेटी’ बताकर शहीद का दर्जा देने का कुत्सित प्रयास किया।
एल्गार परिषद का जाल और पंजाब के पुल की वह साज़िश
जब जिहादी मंसूबे नाकाम हुए, तो वामपंथी उग्रवाद (अर्बन नक्सल) के छद्म चेहरों-स्टैन स्वामी, नवलखा, सुधा भारद्वाज और रोना विल्सन जैसों ने एल्गार परिषद की आड़ में प्रधानमंत्री की हत्या का ताना-बाना बुना। लेकिन तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार और सुरक्षा तंत्र ने समय रहते इस देशद्रोही गिरोह का भंडाफोड़ कर उन्हें सलाखों के पीछे धकेल दिया।
साज़िशों की पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब पंजाब के एक फ्लाईओवर पर देश के प्रधानमंत्री के काफिले को राजनीतिक मिलीभगत से खालिस्तानी तत्वों के सामने 20 मिनट तक असुरक्षित छोड़ दिया गया। सोशल मीडिया पर वायरल हुई उस वीर एसपीजी (SPG) कमांडर की सतर्क और आक्रामक मुद्रा वाली तस्वीर आज भी हर देशभक्त के रोंगटे खड़े कर देती है, जो अकेला ही हज़ारों दुश्मनों की छाती चीरने के लिए तैयार खड़ा था। यह केवल एक सुरक्षा चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित जानलेवा हमला था, जिसे प्रधानमंत्री की सूझबूझ और जांबाज़ कमांडो ने विफल कर दिया।
नियति का निर्णय: जब महाकाल चुनते हैं अपना नायक
विरोधी चाहे सीमा पार से पाकिस्तान के हुक्मरानों के आगे “मोदी को हटाओ” की भीख मांगें, या संसद में हताशा में यह कहें कि “मोदी क्या उसका बाप भी जाएगा”-उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि नरेंद्र मोदी कहीं नहीं जाने वाले। वे किसी राजनीतिक गणित की उपज नहीं हैं, वे नियति द्वारा चुने गए वह राष्ट्रशिल्पी हैं जिनका जन्म सदियों के सांस्कृतिक अंतद्वंद्व को समाप्त करने के लिए हुआ है।
गोस्वामी तुलसीदास के स्वप्न, छत्रपति शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य के संकल्प और पांच सौ वर्षों के संघर्ष के बाद अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर के पुनरुद्धार का जो ऐतिहासिक कार्य इस युग में संपन्न हुआ है, वह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि इस व्यक्ति के पीछे स्वयं दैवीय और राष्ट्रीय चेतना की शक्ति काम कर रही है। जब नियति किसी को ऐसे युगांतकारी कार्यों के लिए चुनती है, तो संपूर्ण ब्रह्मांड उसकी रक्षा के लिए तत्पर हो जाता है।
अहंकार का पतन और कर्मों का चक्रव्यूह
प्रधानमंत्री के विनाश की कामना करने वाले और सोशल मीडिया पर उनकी ‘तेरहवीं’ मनाने वाले आज खुद राजनीतिक और नैतिक पतन के गर्त में जा चुके हैं। कर्मों का विधान अचूक होता है। जो कभी इशरत जहां को अपनी बेटी बताकर राजनीति चमका रहे थे, आज वे उन्हीं मोदी की छत्रछाया में आने को मजबूर हैं। देश-विदेश में जिसने भी इस भारतपुत्र का पुरजोर और कुटिल विरोध किया- चाहे वे देश के भीतर के क्षेत्रीय क्षत्रप हों या वैश्विक मंच पर भारत को नीचा दिखाने वाले इमरान खान, महाथिर मोहम्मद, कनाडाई प्रधानमंत्री ट्रूडो या मालदीव के पूर्वज उन सभी को इतिहास के पन्नों में हाशिए पर जाना पड़ा है।
नरेंद्र मोदी का यह सफर तब तक अनवरत जारी रहेगा, जब तक मां भारती को परम वैभव के शिखर पर पहुंचाने का उनका ईश्वरीय कार्य पूर्ण नहीं हो जाता। राष्ट्रभक्ति की अग्नि में तपा यह व्यक्तित्व साज़िशों के हर चक्रव्यूह को भेदकर आगे बढ़ता रहेगा, क्योंकि जिसके साथ देश की 150 करोड़ जनता का आशीर्वाद और महाकाल का कवच हो, उसका पतन सुनिश्चित करने का ख्वाब देखने वाले खुद इतिहास के मलबे में तब्दील हो जाते हैं।
[लेखक भाजपा प्रवक्ता है]
