प्रो. विधु रावल
काश 1971 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होते! यह विचार महज ऐतिहासिक कल्पना नहीं रह गया है। यह उस नेतृत्व की अनुपस्थिति की याद दिलाता है, जिसकी पूर्ति आज प्रधानमंत्री मोदी के रूप में हो रही है। 1971 की महान सैन्य विजय को शिमला की मेज पर इंदिरा गांधी की कूटनीतिक शून्यता ने हार में दिया गया था। अगर उस निर्णायक क्षण में मोदी जैसा दृढ़, दूरदर्शी और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाला नेतृत्व होता, तो आज शायद बांग्लादेश भारत का अभिन्न अंग होता, पाक अधिकृत कश्मीर वापस भारत के मानचित्र पर होता, पाकिस्तान को निर्णायक सबक सिखाया गया होता और उसके परमाणु कार्यक्रम की जड़ें ही काट दी गई होतीं। आज, जब मोदी के नेतृत्व में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में भारत ने अप्रत्याशित और निर्णायक कूटनीतिक सफलता हासिल की है, तो यह स्पष्ट हो गया है कि नेतृत्व की गुणवत्ता ही इतिहास की दिशा तय करती है।
ब्रिक्स सम्मेलन 2026 प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत कूटनीतिक क्षमता का सबसे बड़ा प्रमाण बनकर उभरा है। प्रतिस्पर्धी हितों वाले देशों चीन, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात समेत अन्य को एक साझा घोषणापत्र पर सहमत कराना सामान्य उपलब्धि नहीं है। परस्पर प्रतिस्पर्धी और प्रतिद्वंद्वी देशों का संयुक्त घोषणापत्र ‘दिल्ली डिक्लेरेशन’ पर सभी स्थाई व अस्थाई देश के हस्ताक्षर ने ब्रिक्स सम्मेलन 2026 को ऐतिहासिक बना दिया है। दिल्ली घोषणापत्र में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार और भारत की केंद्रीय भूमिका की बात स्पष्ट रूप से दर्ज हुई। यह उपलब्धि मोदी की निरंतर और दृढ़ कूटनीति का परिणाम है। यह विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती हैसियत का प्रमाण है। परंतु इस ऐतिहासिक दस्तावेज की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही पिछले वर्ष जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए कायराना आतंकी हमले की पुरजोर निंदा और भारत की सीमा पार आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने की कार्रवाई का समर्थन इन सभी देशों ने किया। बिना किसी देश का नाम लिए राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के विरुद्ध साझा रुख अपनाना, व्यवहार में पाकिस्तान की नीतियों के खिलाफ वैश्विक दबाव बनाने का प्रभावी कदम सिद्ध हुआ। यह सफलता अप्रत्याशित इसलिए मानी जा रही है क्योंकि कई सदस्य देश पहले अलग रुख रखते थे। मोदी की व्यक्तिगत पहल और भारत हित को सर्वोपरि रखने वाली स्पष्ट नीति ने इस परिवर्तन को संभव बनाया।
मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति ने स्वतंत्रता और प्रभाव का नया संतुलन स्थापित किया है। अब तक भारत में ही ‘मोदी है तो मुमकिन’ की गूंज सुनाई देती थी। अब यह ललकार विदेश नीति में भी गूंज रही है। मोदी के करिश्माई नेतृत्व के आगे पूरी दुनिया नतमस्तक हो रही है। युद्ध के कालखंड में ईरान और सऊदी अरब जैसे परस्पर विरोधी पक्षों को एक मंच पर लाना, इजरायल के साथ घनिष्ठ संबंधों के बावजूद गाजा पर स्पष्ट रुख अपनाना, तथा पश्चिमी देशों के साथ व्यापारिक सहयोग बनाए रखते हुए रूस के साथ मजबूती से खड़े रहना मोदी की रणनीतिक स्पष्टता को घोषित करते हैं। यह प्रधानमंत्री मोदी के ‘भारत सर्वप्रथम और भारत हित सर्वोपरि’ के मूल मंत्र को रेखांकित करता है।‘भारत सर्वप्रथम’ की नीति अब केवल घोषणा नहीं, बल्कि व्यवहार में परिणत हो चुकी है। दुनिया अब यह समझने लगी है कि मोदी के नेतृत्व में भारत न तो दबाव में झुकता है और न ही अपने हितों से समझौता करता है।
इन उपलब्धियों की पृष्ठभूमि में ऐतिहासिक प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। यदि पंडित नेहरू की बजाय नरेंद्र मोदी जैसा योग्य और दूरदर्शी नेतृत्व भारत को 1947 में मिल गया होता, तो क्या भारत का दुर्भयपूर्ण और पीड़ादायी विभाजन रोका जा सकता था? क्या चीन को तिब्बत हड़पने से रोका जा सकता था? क्या भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और वीटो पावर दिलवाई जा सकती थी? क्या एकतरफा और पक्षपाती सिंधु जल संधि को टालकर भारत के किसानों की लाखों एकड़ भूमि को बंजर होने से बचाया जा सकता था? क्या 1962 के युद्ध में भारत की शर्मनाक हार न होती? क्या 1971 की महान सैन्य जीत का विस्तार करके मुजफ्फराबाद, गिलगित और बाल्टिस्तान समेत पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान से मुक्त करवाकर भारत में जोड़ा जा सकता था और ढाका तथा चटगांव समेत पूरे पूर्वी पाकिस्तान को भारत में मिलाकर फिर से रबींद्रनाथ टैगोर का ‘आमार सोनार बांग्ला’ यानी विशाल बंगाल प्रदेश बनाया जा सकता था? क्या अयोग्य और अनुभवहीन वंशवादी राजीव गांधी भारत की अर्थव्यवस्था को चौपट करने वाले निर्णयों के कारण देश को सोना गिरवी रखने की शर्मिंदगी से बचाया जा सकता था?
यदि 1947 के बाद के निर्णायक दशकों में मोदी जैसा नेतृत्व होता, तो विभाजन, तिब्बत का प्रश्न, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता, सिंधु जल संधि, 1962 का युद्ध और 1971 की विजय के बाद हुई राजनीतिक हार के परिणाम भिन्न हो सकते थे? ये प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे वर्तमान नेतृत्व की विशिष्टता को स्थापित करते हैं। ये सब प्रश्न करिश्माई नरेंद्र मोदी की अपार सफलताओं के बाद ‘काश’ बनकर सोचने को मजबूर कर रहे हैं। भारत के तत्कालीन कमजोर, अयोग्य, वंशवादी और अदूरदर्शी नेतृत्व की कीमत हम आज तक चुका रहे हैं। परंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हर कदम के साथ भारत को महानता की सीढ़ियों पर चढ़ा रहे हैं।मोदी ने न केवल सीमाओं पर सुरक्षा को मजबूत किया है, बल्कि कूटनीतिक मेजों पर भी भारत को निर्णायक भूमिका में ला खड़ा किया है।
आज भारत वैश्विक मंच पर अपनी आवाज को पहले से अधिक प्रभावी ढंग से रख रहा है। 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य मोदी के नेतृत्व में ठोस दिशा प्राप्त कर चुका है। उनकी कूटनीति ने यह सिद्ध कर दिया है कि दृढ़ता और रणनीतिक धैर्य दोनों एक साथ संभव हैं। भारत माता को परम वैभव के शिखर पर सिंहासनारूढ़ करके सदियों बाद फिर से विश्वगुरु बनने का मार्ग अब प्रत्याशित दिख रहा है।
ईश्वरीय शक्तियों द्वारा शायद नरेंद्र मोदी को भारत के उदय के लिए भेजा गया है। उत्तिष्ठ भारत का उत्कर्ष अब निश्चित लग रहा है। मोदी युग में भारत न केवल सीमाओं पर बल्कि मेजों पर भी जीत रहा है। कूटनीति अब कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति का विस्तार बन चुकी है। विश्व मंच पर भारत की आवाज अब स्पष्ट, गूंजती और सम्मानित है।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत अब इतिहास की अधूरी संभावनाओं को वर्तमान उपलब्धियों में बदल रहा है। यह प्रक्रिया जारी है। नेतृत्व की यही गुणवत्ता भारत को नई ऊँचाइयों की ओर ले जा रही है। काश 1971 में मोदी होते… पर आज वे हैं, और भारत उनके साथ आगे बढ़ रहा है। यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति और सबसे बड़ा गर्व है।
[लेखक भाजपा के प्रवक्ता हैं]
