चुप्पी से सत्ता चलती है और सवाल से लोकतंत्र

उंगली सिर्फ मोबाइल चलाने के लिए नहीं, सत्ता से सवाल करने के लिए भी है

किसी गरीब आदमी के पास सरकार तक अपनी बात पहुँचाने के कितने रास्ते होते हैं? न उसके पास बड़े लोगों के फोन नंबर होते हैं, न महँगे वकीलों की फौज। उसके पास एक वोट होता है और अपनी आवाज होती है। अगर वोट पर सवाल खड़े होने लगें और आवाज उठाने पर भी उसे परेशानी समझा जाए, तो वह आखिर जाए कहाँ?

इसीलिए लोकतंत्र में धरने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन की जगह होनी चाहिए। जनता का सड़क पर उतरना सरकार की बेइज्जती नहीं है। वह इस बात की याद दिलाता है कि चुनाव जीतने के बाद भी जनता को सुनना पड़ता है।

हम गर्व से कहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस गर्व का आधार भी है। चुनाव आयोग के आँकड़ों के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव में लगभग 97.98 करोड़ पंजीकृत मतदाता थे और 64.64 करोड़ वोट पड़े। इतने विशाल चुनाव का आयोजन बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसी विशाल व्यवस्था की असली परीक्षा उस अकेले व्यक्ति के सामने होती है, जो मतदान केंद्र पहुँचकर जानता है कि सूची में उसका नाम ही नहीं है।

उस व्यक्ति के लिए लोकतंत्र का मतलब करोड़ों मतदाताओं का आँकड़ा नहीं है। उसके लिए सवाल सीधा है—क्या मैं अपना वोट दे सकता हूँ?

मतदाता सूचियों को लेकर उठ रहे विवाद को इसी नजर से देखना चाहिए। बिहार में 2025 के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान शुरुआती मसौदा सूची से 65 लाख नाम बाहर हुए। इसके बाद करीब 3.66 लाख और नाम हटे, जबकि 21.53 लाख नाम जोड़े गए। अंतिम सूची में मतदाताओं की संख्या लगभग 7.89 करोड़ से घटकर 7.42 करोड़ रह गई—यानी करीब 47 लाख की शुद्ध कमी।

यहाँ एक जरूरी फर्क समझना होगा। हटाए गए हर नाम को किसी जीवित, पात्र नागरिक का छीना हुआ वोट कहना सही नहीं होगा। आयोग के बताए कारणों में मृत्यु, स्थायी पलायन या अनुपस्थिति और एक से अधिक जगह पंजीकरण शामिल थे। लेकिन सवाल यह है कि इन कारणों की जाँच कितनी भरोसेमंद थी और किसी गलत तरीके से बाहर हुए व्यक्ति के लिए वापस सूची में शामिल होना कितना आसान था।

सूची सही करने का काम जरूरी है। मगर व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि गलती सुधारने का बोझ उसी नागरिक पर न टूट पड़े, जिसके पास सबसे कम साधन हैं। दिहाड़ी मजदूर के लिए सरकारी दफ्तर का एक चक्कर सिर्फ किराया नहीं है; वह उस दिन की मजदूरी भी है। कागज जुटाना, आवेदन करना और बार-बार अपनी बात समझाना उसके लिए वास्तविक मुश्किलें हैं।

जब चुनाव कराने वाली संस्था और उसके प्रमुख पर पक्षपात के गंभीर आरोप लगें, तो चिंता और बढ़ जाती है। हाल के विरोध प्रदर्शनों में विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग की और मतदाता पंजीकरण में हेरफेर के आरोप लगाए। चुनाव आयोग और सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया है। इसलिए आरोपों को साबित तथ्य मान लेना ठीक नहीं है। फिर भी, इतने गंभीर सवालों का स्पष्ट और जाँचने योग्य जवाब जनता को मिलना चाहिए।

चुनाव आयोग पर भरोसा किसी एक पार्टी की जरूरत नहीं है। आज जो सत्ता में है, कल विपक्ष में हो सकता है। निष्पक्ष चुनाव का भरोसा टूटेगा तो नुकसान पूरे देश को होगा।

इसलिए जवाब में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होना चाहिए कि सब कुछ नियम से हुआ है। लोगों को समझ आना चाहिए कि नाम क्यों हटे, गलतियाँ कैसे पहचानी गईं और जिनकी शिकायत सही निकली, उन्हें राहत कैसे मिली। संस्थाएँ अपना सम्मान पारदर्शिता और जवाबदेही से मजबूत करती हैं।

जनता की भी जिम्मेदारी है। हम दिन भर मोबाइल पर राजनीति देखते हैं, बहस करते हैं, नाराज होते हैं और अगली वीडियो पर चले जाते हैं। कई बार हमें अपने पसंदीदा नेता का भाषण याद होता है, लेकिन अपने इलाके की मतदाता सूची की स्थिति नहीं मालूम होती।

मोबाइल बेकार साधन नहीं है। उससे जानकारी मिल सकती है, लोग जुड़ सकते हैं और अन्याय सामने आ सकता है। मगर साझा की गई पोस्ट के बाद भी काम बचता है। अपना नाम जाँचना, पड़ोसी की मदद करना, शिकायत दर्ज करना और उसके जवाब का पीछा करना भी नागरिक भागीदारी है। लोकतंत्र को हमारी नाराजगी के साथ हमारा समय भी चाहिए।

नेताओं की शैक्षणिक डिग्री पर तंज कसने से भी बात पूरी नहीं होगी। कम पढ़ा व्यक्ति ईमानदार और समझदार हो सकता है; बहुत पढ़ा व्यक्ति भी सत्ता का दुरुपयोग कर सकता है। कसौटी यह होनी चाहिए कि नेता सवाल सुनता है या नहीं, जनता के प्रति जवाबदेह है या नहीं और अपने पद की सीमाएँ मानता है या नहीं।

धरने सत्ता को जनता की ताकत का अहसास कराते हैं। लेकिन हर समस्या का समाधान केवल प्रदर्शन से नहीं होगा। विरोध को संगठन, लगातार निगरानी और राजनीतिक भागीदारी तक ले जाना पड़ेगा।

अगर हम राजनीति को दलदल कहकर उससे दूर रहेंगे, तो उसे साफ करने का काम कौन करेगा? ईमानदार और जिम्मेदार लोगों को स्थानीय निकायों, पंचायतों, राजनीतिक दलों और चुनावों में भाग लेना होगा। हर व्यक्ति को चुनाव लड़ना जरूरी नहीं, लेकिन सार्वजनिक जीवन को कुछ लोगों के भरोसे छोड़ देना भी ठीक नहीं।

जिस लोकतंत्र पर हमें गर्व है, उसे बचाने के लिए इतना तो करना ही होगा कि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से कटे तो हम उसे उसकी निजी परेशानी समझकर आगे न बढ़ जाएँ।

मोबाइल पर चलने वाली उंगली जब मतदान के दिन स्याही लगवाती है, तभी जनता सत्ता तय करती है। उस उंगली का अधिकार बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।

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