युद्ध केवल शस्त्रों की गर्जना नहीं, पुरुषार्थ का श्रृंगार है: प्रो. विधु रावल

युद्ध केवल रक्त गाथा नहीं है, यह आत्मसम्मान की अग्निपरीक्षा है। जब शत्रु सिंहनाद करता है, तो वीर राष्ट्रों के लिए वह अरण्य नहीं, उत्सव बन जाता है। युद्ध केवल शस्त्रों की गर्जना नहीं है, यह आत्मा के भीतर जलती उस अग्नि का नाम है, जो अन्याय के अंधकार को भस्म करने के लिए धधकती है। जब अधर्म, असत्य और अन्याय के अंधकार से पृथ्वी कांपने लगे, तब धर्म के पक्ष में खड़ा होना ही सर्वोच्च नैतिकता है। युद्ध, तब एक अपराध नहीं, बल्कि कर्तव्य बन जाता है। जब कोई राष्ट्र सहनशीलता की अंतिम सीमा पार कर चुका हो, तब युद्ध केवल प्रतिक्रिया नहीं होता, वह धर्म की पुकार बन जाता है। भारत भूमि शांतिप्रिय है, किंतु जब-जब अन्याय की लहरें उठीं, तब-तब इसके पुत्रों ने गांडीव उठाया, शस्त्र नहीं धर्म उठाया।

आज भी कुछ ऐसे लोग हैं, जो महाभारत के कौरवों की तरह अधर्म पर मौन धारण कर बैठे थे। पर जब अर्जुन का गांडीव शत्रु की छाती पर गरजता है, तब वही शांतिदूत ‘शांति’ का राग अलापते हैं। यह राग नहीं, रक्तहीन आत्मा की करुणा है, जो रण को अपवित्र कहती है। परंतु सच तो यही है कि युद्ध नहीं जिनके जीवन में, वे या तो प्रण से डिगे होंगे, या रण से भागे होंगे।

1947 का विभाजन हमारे इतिहास की सबसे गहरी पीड़ा थी।
हमने केवल भूखंड नहीं खोया, हम नैतिक और भावनात्मक रूप से भी घायल हुए। पर फीनिक्स की भांति हमने पुनः जन्म लिया, जलकर भी जीवित हुए, टूटकर भी अडिग रहे। पाकिस्तान दशकों से पश्चिमी देशों की आँख का तारा बनकर भी विश्वभर में आतंकवाद के ज़हर को निरंतर घोलता रहा। पारंपरिक युद्धों में भारत से प्रचंड हार के बावज़ूद पाकिस्तान ‘हज़ार घावों की नीति’ के अंतर्गत दशकों तक भारत की सहिष्णुता की परीक्षा लेता रहा।

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में जो हुआ, वह केवल एक आतंकी हमला नहीं था। वह मानवता पर एक सुनियोजित, क्रूर प्रहार था। यह सहिष्णु और न्यायप्रिय राष्ट्र की आत्मा को ललकारना था। लेकिन यह पहला अवसर नहीं है जब भारत ने ऐसा घाव झेला है। दशकों से पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद, ‘हज़ार कटों की नीति’ के अंतर्गत भारत को बार-बार लहूलुहान करता रहा है।

परंतु भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के माध्यम से आज वह लकीर खींच दी है, जहाँ से आगे हर वार का उत्तर दोगुनी तीव्रता से दिया जाएगा। यह केवल सैन्य प्रतिशोध नहीं, यह एक नवीन रणनीतिक चेतना है। भारत ने उस आतंकी सोच को जवाब दिया है जो दशकों से पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों की गोद में पल रही थीं। स्पष्ट संदेश है कि भारत अब शांति की भीख नहीं माँगेगा, बल्कि आत्मरक्षा हेतु दुश्मन द्वारा थोपे गए युद्ध में मुँहतोड़ जवाब देने के लिए भी तत्पर है। यह केवल एक सैन्य प्रतिक्रिया नहीं, यह रणनीतिक पुनरुत्थान है जो कहता है कि भारत अब ‘हज़ार घावों’ की पीड़ा नहीं सहन करेगा।

यह युद्ध जितना टैंक, मिसाइल और रणनीति का है, उतना ही राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी है। रण की विजय केवल शस्त्रों से नहीं होती उसके लिए राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए और इतिहास साक्षी है कि जब संकल्प अडिग होता है, तो विजय स्वयं चलकर आती है। कोई भी सैन्य विजय तब तक संपूर्ण नहीं होती, जब तक उसकी नीति स्पष्ट और उसका लक्ष्य निर्णायक न हो।

आज भारत रणभूमि में नहीं, धर्मभूमि में खड़ा है।जहाँ से वह न केवल अपनी सीमाओं की सुरक्षा कर रहा है, बल्कि भविष्य की उन पीढ़ियों को एक ऐसा भारत देने चला है जो शांति में विश्वास करता है, परंतु शक्तिशाली है और अपने सम्मान के साथ समझौता नहीं करता। भारतीय सेना केवल शौर्य की मूर्ति नहीं, यह धर्म, सत्य और नैतिकता की रक्षा हेतु खड़ी जीवंत दीवार है। इनके लिए युद्ध केवल ज़मीन जीतने का साधन नहीं, बल्कि मानवता और न्याय को जीवित रखने की प्रतिज्ञा है। भारतीय सेना सिर्फ़ एक लड़ाकू बल नहीं, बल्कि राष्ट्र की नैतिक सीमाओं की रक्षक है। सैनिकों के हाथों में केवल हथियार नहीं बल्कि एक संकल्प है कि वे हर उस शक्ति के विरुद्ध खड़े होंगे, जो भारत की संप्रभुता, उसकी जनता और उसके हिन्दू मूल्यों को चुनौती दे।

भारत अब बदल चुका है। वह केवल अपने घावों को सहलाने वाला देश नहीं, बल्कि अपने लोगों की सुरक्षा और सम्मान के लिए हर सीमा तक जाने वाला राष्ट्र है। यह भारत का नवजागरण है। यह भारत की निर्णायक पुकार है।और अब कोई गांडीव को रोक नहीं सकता। भारत की जवाबी कार्यवाही संयमित हैं, लक्षित है जो भारत की विवेकशील शक्ति का प्रतीक है। हम विध्वंस नहीं, विनय और विजय के मार्ग पर हैं।
लेखक भाजपा प्रवक्ता हैं।

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