राज्यपाल का पद लंबे समय तक भारतीय राजनीति में केवल औपचारिकता और प्रोटोकॉल का प्रतीक माना जाता रहा है। राजभवन को अक्सर बड़े-बुजुर्ग नेताओं के विश्राम स्थल की तरह देखा गया, जहां गतिविधियाँ केवल दीक्षांत समारोहों या औपचारिक मुलाक़ातों तक सीमित रहती थीं। लेकिन इस सोच को बदलने का श्रेय जाता है एक ऐसे व्यक्तित्व को, जिन्होंने अपने आचरण और कार्यों से यह साबित कर दिया कि राज्यपाल केवल संविधान का औपचारिक प्रहरी ही नहीं, बल्कि जनता का मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत भी हो सकता है। यह व्यक्तित्व हैं— आचार्य देवव्रत। 1981 से गुरुकुल कुरुक्षेत्र में आचार्य के पद पर कार्यरत रहे, वेदों और महर्षि दयानंद सरस्वती की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुँचाने वाले, गौ-सेवा और संस्कारमयी शिक्षा के प्रबल पक्षधर आचार्य देवव्रत ने जब हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का पद संभाला, तब इस धारणा को बदल डाला।
राजभवन, जो कभी सिर्फ़ औपचारिक मेहमानों के लिए खुलता था, उन्होंने उसे आमजन के लिए खोल दिया। किसान, युवा, विद्यार्थी, समाजसेवी—हर कोई उनसे बिना किसी रोक-टोक मिल सकता था। वे कहते हैं, “राजभवन जनता का है, तो उसके दरवाज़े भी जनता के लिए खुले रहने चाहिए।”
युवाओं को नशामुक्ति और संस्कृति का संदेश
राज्यपाल बनने के बाद आचार्य देवव्रत ने युवाओं से नशा छोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने उन्हें भारतीय संस्कृति और संस्कारों की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया। यह संदेश केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यवहार में भी दिखा।
प्राकृतिक खेती की क्रांति
आज उन्हें प्राकृतिक कृषि के अग्रदूत के रूप में जाना जाता है। उन्होंने केवल एक दो राज्य नहीं बल्कि देश के कई राज्यों में प्राकृतिक कृषि से जुड़े कार्यक्रम कर किसानों से सीधा संवाद किया और किसानों से वे आग्रह करते कि जहरीले कीटनाशक और रसायनों से दूर रहकर प्राकृतिक कृषि अपनाएँ। शुरूआत में किसानों को यह कठिन लगा, लेकिन उनकी निरंतर प्रेरणा और संवाद ने धीरे-धीरे वातावरण बदल दिया। हिमाचल प्रदेश प्राकृतिक खेती की राह पर चलने वाला देश का अग्रणी राज्य बन गया और गुजरात, हरियाणा समेत कई राज्यों के किसान उनसे प्रेरित हो प्राकृतिक कृषि को अपना रहे हैं।
राजभवन के अंग्रेज़ों के समय के बने बार को तोड़कर उन्होंने वहाँ यज्ञशाला बनवाई और कहा कि संस्कार और संस्कृति ही हमारी पहचान है। कामधेनु गाय को राजभवन का पारिवारिक सदस्य बना दिया। यज्ञ और गौसेवा की परंपरा ने राजभवन की छवि को नई पहचान दी। राज्यपाल गुजरात आचार्य देवव्रत को महाराष्ट्र राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार दिया गया है, इस दौरान उन्होंने संस्कृत भाषा में शपथ ग्रहण की और लोगों को विश्व की सबसे प्राचीन भाषा अपनाने का संदेश दिया।
गुजरात में भी वही समर्पण
बाद में जब उन्हें गुजरात का राज्यपाल बनाया गया, तब भी उन्होंने प्रतिदिन यज्ञ की परंपरा जारी रखी। किसानों के बीच बैठकर उनकी समस्याएँ सुनीं, उनके साथ भोजन किया और प्राकृतिक खेती का संदेश फैलाया। वे कहते थे:
“जिस धरती माँ ने हमें अन्न और फल दिए, क्या हम उसे बंजर होने देंगे? जहरीले रसायनों से न केवल भूमि, बल्कि जल और वायु भी विषाक्त हो रही है। लाखों लोग बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।” आज उनके प्रयासों से गुजरात में किसान लगातार प्राकृतिक खेती को अपना रहे हैं और अन्य किसानों को भी जागरूक कर रहे हैं।
गुरुकुल की शिक्षा और समाज-सेवा
गुरुकुल कुरुक्षेत्र के 180 एकड़ प्राकृतिक कृषि फार्म में उन्होंने स्वयं प्राकृतिक कृषि कर सभी को यह संदेश दिया कि प्राकृतिक कृषि ही किसानों की आय दोगुनी करने में सक्षम है और प्राकृतिक कृषि के माध्यम से ही कामधेनु गाय को बचाया जा सकता है। गुरुकुल कुरुक्षेत्र के कृषि फार्म पर देश-विदेश के कृषि वैज्ञानिक आकर सीखते हैं कि किस तरह खेती को प्रकृति के साथ जोड़कर स्थायी बनाया जा सकता है। यहाँ किसानों को निःशुल्क प्रशिक्षण, आवास और भोजन मिलता है। उन्होंने प्राकृतिक कृषि के साथ-साथ लाखों छात्रों को भारतीय वैदिक शिक्षा, संस्कार और संस्कृति से जोड़कर उन्हें समाज और राष्ट्र-सेवा की राह पर अग्रसर किया है। आज देश की नहीं बल्कि विदेश में भी गुरुकुल कुरुक्षेत्र का बड़ा नाम है और हजारों छात्र देश के विभिन्न राज्यों से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
आमजन के राज्यपाल
आज वे सिर्फ़ एक राज्यपाल नहीं, बल्कि आमजन के राज्यपाल कहलाते हैं। उन्होंने दिखा दिया कि अगर संकल्प और समर्पण हो तो संवैधानिक पद भी समाज में जीवन-सुधार और क्रांति का माध्यम बन सकता है। उनकी छवि यह सिखाती है कि पद की गरिमा केवल रस्मी दायरे में नहीं, बल्कि आमजन की सेवा में है। असली नेतृत्व वही है, जो जनता के बीच बैठकर, उनकी समस्याएँ समझकर समाधान खोजे।
संस्कार, संस्कृति और प्राकृतिक जीवनशैली ही समाज और धरती के भविष्य की कुंजी है। आचार्य देवव्रत आज भी लाखों किसानों, युवाओं और छात्रों के लिए प्रेरणा हैं। उन्होंने अपने कार्यों से यह सिद्ध कर दिया है कि राज्यपाल केवल संवैधानिक पद नहीं, बल्कि समाज-परिवर्तन का जीवंत प्रतीक भी हो सकता है।
प्रदीप दलाल की कलम से…..
