शरणागति से ही परमात्मा के कृपापात्र बनाना संभव : स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य
श्रीसिद्धदाता आश्रम-श्रीलक्ष्मीनारायण दिव्यधाम के स्थापना दिवस का आनंदोत्सव मनाया
फरीदाबाद। सूरजकुंड मार्ग स्थित श्रीलक्ष्मीनारायण दिव्यधाम-श्रीसिद्धदाता आश्रम में बुधवार को आश्रम के संस्थापक वैकुंठवासी श्रीमद जगदगुरु श्री रामानुजाचार्य स्वामी सुदर्शनाचार्य जी महाराज की जयंती और श्रीसिद्धदाता आश्रम के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में आनंदोत्सव आयोजित किया गया। श्रीरामानुज संप्रदाय की तीर्थपीठ इंद्रप्रस्थ एवं हरियाणा पीठाधीश्वर अनंतश्री विभूषित श्रीमद जगदगुरु श्रीरामानुजाचार्य स्वामी श्रीपुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने सबसे पहले वैकुंठवासी स्वामी श्रीसुदर्शनाचार्य जी महाराज की समाधि पर पूजन किया गया और फूलो की चादर चढ़ाई और जनकल्याण के लिए यज्ञ किया। साथ ही स्वामी श्रीपुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने मंदिर में वैकुंठवासी स्वामी सुदर्शनाचार्य जी महाराज के दिव्य विग्रह का अभिषेक किया और 56 भोग अर्पित किए।
इस अवसर पर श्रद्धालुओ के बीच प्रवचन करते हुए इंद्रप्रस्थ एवं हरियाणा पीठाधीश्वर स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने कहा कि गुरु महाराज ने भक्तों के कल्याण के लिए शरणागति का ही मंत्र दिया। इसलिए ईश्वर के प्रति समर्पण भाव संपूर्ण शरणागति ही मोक्ष की राह दिखा सकती है। इसके लिए श्रद्धालुओं को समाजिक सदव्यवहार करते हुए शरणागति करनी चाहिए। सदगुणों से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा व स्फूर्ति होगी तो समर्पण भाव मजबूत होगा और समर्पण भाव से ही परमात्मा का सान्निध्य संभव हैं। लेकिन इसके लिए सदगुरु चाहिए। जीवन में गुरू स्थान सर्वोच्च है। सदगुरु के बताए सदगुण अपनाकर जीवन को सरल किया जा सकता है। शरणागति से जीवन में नई ऊर्जा व स्फूर्ति आती है।
समर्पण भाव से गुरू की शरण में आए श्रद्धालु के दुर्गुण व पाप का संहार हो जाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का असली बंधन उसके कर्म हैं। मानवता परहित से ही आती है। परहित भाव ही व्यक्ति को महान बनाता है। उन्होंने कहा कि मृत्युलोक का अपना विधान है, पिछले जन्मों के प्रारब्धों को भोगना पड़ता है। इससे पहले आनंदोत्सव में महिलाओ ने कलश यात्रा निकाली। प्रस्तुत किए गए सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कलाकारों ने अपनी आवाज का जादू ऐसा बिखेरा किए श्रद्धालुगण घंटों तक मंत्रमुग्ध होकर मधुर संगीतमयी भजनों पर झूमते रहे।…देना हो तो दीजिए जन्म जन्म का साथ। ..मेरा बाबा मेरे साथ है, तो डरने की क्या बात है- आदि संगीतमयी भक्ति गीतों से लोग मंत्रमुग्ध हो गए।
