कुमाऊँ की होली: संगीत, भक्ति और लोकसंस्कृति का अद्भुत संगम
उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि संगीत, भक्ति और सामूहिक उल्लास का जीवंत पर्व है। यहाँ होली की शुरुआत बसंत पंचमी से ही हो जाती है और करीब डेढ़ महीने तक पूरे क्षेत्र में राग, रंग और रस का अनोखा माहौल बना रहता है। कुमाऊँ में होली तीन रूपों में मनाई जाती है—बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली—और तीनों ही रूप अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण लोकसंस्कृति की धरोहर माने जाते हैं।
हर शाम होल्यार घर-घर जाकर ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम की संगत में भक्ति से सराबोर होलियां गाते हैं। रागों पर आधारित इन होलियों में जहाँ प्रेम और भक्ति की मधुर अभिव्यक्ति होती है, वहीं सामाजिक और सांस्कृतिक विषय भी सहज रूप से स्थान पाते हैं। सुर-लय के इस संगम से पूरा वातावरण भक्तिमय और आनंदपूर्ण हो उठता है।
होली केवल संगीत का ही उत्सव नहीं, बल्कि स्वाद का भी पर्व है। गायन के दौरान कुमाऊँ के पारंपरिक व्यंजनों— आलू के गुटके, गुजिया, कचौड़ी, और भांग की चटनी—की सुगंध माहौल को और विशेष बना देती है। पुराने समय में होली आयोजनों में गुड़ तोड़कर बांटने की परंपरा थी। समय के साथ पकवान भले ही विविध हुए हों, लेकिन होली गायन की परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है।
फ़रीदाबाद में रह रहे परवासी उत्तराखंडी अपनी परंपरा को बनाए हुये हैं। झोड़ा, खड़ी होली , महिला होली का लगभग पूरे फ़रीदाबाद मैं आयोजन होता है। घर घर जाकर होली गायन होता है। कुमाऊँ मित्र वेलफ़ैयर सोसाइटी ( रजि) से जुड़े और सैक्टर 9 फरीदाबाद निवासी डॉ मनोज उप्रेती ने बताया कि होली गायन के साथ कुमाऊँ के पारंपरिक व्यंजनों का समावेश होली को विशेष बना देती है। डॉ उप्रेती ने कहा कि कुमाऊँ की होली केवल मनोरंजन भर नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कृति, संगीत और सामुदायिक सौहार्द को सहेजने का सशक्ति माध्यम है।
