स्वर्णिम अतीत से स्वावलंबन तक: भारत का वैभवपथ
प्रो. विधु रावल
जो लोग यह कहकर भारत का उपहास उड़ाते हैं कि “1947 से पहले भारत में सुई तक नहीं बनती थी”, उन्हें इतिहास के उन धुंधलाए पन्नों को फिर से पढ़ना चाहिए, जिन पर आज भी भारत की गौरवगाथा अमिट अक्षरों में अंकित है। भारत वह भूमि है जहाँ केवल सुई, तलवार या रथ ही नहीं बल्कि संपूर्ण सभ्यता उस समय से अपने चरम उत्कर्ष पर थी, जब यूरोप के अधिकांश लोग जंगलों में जीवन जी रहे थे। यह वही भारत है जहाँ विज्ञान, चिकित्सा, गणित, ज्योतिष, दर्शन और शिल्प सभी क्षेत्रों में अनुपम उत्कर्ष था।
औद्योगिक क्रांति नहीं, औपनिवेशिक लूट थी
अंग्रेजों ने जब भारत को उपनिवेश बनाया, तो उन्होंने केवल भूगोल नहीं छीना—बल्कि हमारी आर्थिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक आत्मा को भी कुचला। जिस औद्योगिक क्रांति को हम स्कूलों में पढ़ते आए हैं, उसकी घड़ी और भारत की लूट की घड़ी यदि एक साथ मिलाकर देखी जाए, तो साफ़ होता है कि यह क्रांति भारत जैसे देशों के संसाधनों की लूट पर टिकी थी। इंग्लैंड की मिलों के लिए बाज़ार बनाने के लिए भारत की स्वदेशी उत्पादन व्यवस्था को योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया गया।
भारतीय बुनकरों, लुहारों, बढ़ईयों और कारीगरों की हज़ारों वर्षों की परंपरा को इस तरह कुचला गया कि एक समय के बाद भारत केवल ‘कच्चा माल’ देने वाला उपनिवेश रह गया। सूत, रेशम, इत्र, स्टील, नाव निर्माण, यहाँ तक कि जटिल खगोल यंत्रों के निर्माता देश को ‘सुई तक न बना पाने वाला’ कह देना, इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना है।
दबाया गया इतिहास, मगर नहीं मिट सका भारत का तेज
भारत की शिक्षा व्यवस्था, जहाँ तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय थे, उसे खत्म कर दिया गया और मैकॉले के माध्यम से एक ऐसी व्यवस्था थोपी गई, जिससे हम अपने गौरव को भूल जाएँ। भारत के स्वर्णिम अतीत को इतिहास की पुस्तकों में या तो नजरअंदाज किया गया या तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया।
मगर इतिहास को भुलाया जा सकता है, मिटाया नहीं। भारत का यह तेज़, यह आत्मबल, यह आत्मा जो कभी श्रीकृष्ण के कर्मयोग से प्रेरित थी आज पुनर्जागृत हो चुकी है।
भारत का नवजागरण: फिर से दीप जले हैं
आज जब पश्चिम अपने ही बोझ से चरमराने लगा है, ब्रिटेन में आर्थिक संकट और सामाजिक विघटन की खबरें आम हो चुकी हैं, तब भारत नवप्रभात की रोशनी के साथ दीपावली मना रहा है। यह सूर्य नई आभा लेकर आया है।
नये कालचक्र का उद्गम हुआ है। यह भारत के उदय और उत्कर्ष का समय है। वैभवशाली और समृद्ध भारत एक नया अध्याय लिखने को आतुर है। भारत का शुभांकर युग शुरू हो चुका है। आज भारत पुनः अपने पैरों पर खड़ा है। चंद्रयान से लेकर स्टार्टअप तक, डिजिटल इंडिया से लेकर वैश्विक कूटनीति तक, भारत गाथा आज फिर से गूँजने लगी है। सहस्राब्दी की प्रतीक्षा के बाद ऐसी सकारात्मक स्थितियाँ बनी हैं।
यह नवभारत केवल अतीत की छाया में ही नहीं खड़ा, बल्कि श्रीकृष्ण के कर्म सिद्धांत को साकार करता हुआ, अपने भाग्य को स्वयं गढ़ने के लिए प्रतिबद्ध है।
[लेखक भाजपा के प्रवक्ता हैं।]
