श्रीरामानुज संप्रदाय के दीक्षांत समारोह में बरसी गुरूकृपा से भावुक हुए श्रद्धालुगण

फरीदाबाद। सूरजकुंड मार्ग स्थित श्रीरामानुज संप्रदाय की इंद्रप्रस्थ एवं हरियाणा तीर्थपीठ श्रीलक्ष्मीनारायण दिव्यधाम-श्री सिद्धदाता आश्रम में शुक्रवार को दीक्षांत समारोह आयोजित किया गया। इसमें दिल्ली-एनसीआर के अलवा हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तर-प्रदेश, उत्तराखंड और दक्षिण अफ्रीका समेत देश-विदेश से आए करीब 493 श्रद्धालुओं ने दीक्षा प्राप्त कर ईश्वर के प्रति शरणागति का मार्ग स्वीकार किया। श्रीरामानुज संप्रदाय के इस दीक्षांत समारोह में बरसी गुरूकृपा से भक्तगण भावुक हो गए। श्रीसदगुरुदेव ने भी सभी दीक्षित भक्तों को अपनत्व के भाव से स्वीकार किया। श्रीरामानुज संप्रदाय की इंद्रप्रस्थ एवं हरियाणा तीर्थपीठ के पीठाधीश्वर अनंतश्री विभूषित श्रीमद जगदगुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्रीपुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने दीक्षांत समरोह में आए भक्तो को एक-एक कर दीक्षित किया। इससे पहले श्रीसदगुरुदेव ने सभी भक्तो को श्रीरामानुज संप्रदाय के दीक्षा संस्कार पूर्ण करवाए। इसमें सबसे पहले सभी नव दीक्षार्थियों को यज्ञ, यज्ञोपवीत, शंख-चक्र धारण करवाया गया और उनका नया आध्यात्मिक नामकरण किया गया।

श्रीसंप्रदाय में दीक्षित होने के लिए पंच-संस्कार अनिवार्य हैं, इनमें सबसे पहले ताप संस्कार अर्थात श्रीसदगुरुदेव ने भक्तो के शरीर पर श्री संप्रदाय के चिह्न शंख-चक्र के तप्त चिह्न धारण कराए। फिर पुंड्र संस्कार अर्थात उध्र्व-पुंड्र का विशेष तिलक लगाना सिखाया गया। फिर नाम संस्कार अर्थात सभी भक्तो को एक नया दासत्व नाम भी दिया। इसके बाद मंत्र संस्कार अर्थात सभी भक्तो को एक मूल रहस्य मंत्र की दीक्षा प्रदान करते हुए जाप की विधि के साथ याग संस्कार पूर्ण किया। इस अवसर पर श्रीरामानुज संप्रदाय की इंद्रप्रस्थ एवं हरियाणा तीर्थपीठ के पीठाधीश्वर अनंतश्री विभूषित श्रीमद जगदगुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्रीपुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने कहा कि आखिर गुरु क्यों चाहिए? शास्त्रो में निहित है कि गुरु ही वह शक्ति है जो अज्ञान से ज्ञान की ओर, असफलता से सफलता की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। गुरु के बिना जीवन अधूरा है।

इसलिए हमें सदैव अपने गुरु का सम्मान करना चाहिए और उनके बताए मार्ग पर चलना चाहिए। गुरु ही जीवन का सच्चा पथ प्रदर्शक होता है। वैकुंठवासी सदगुरूदेव स्वामी सुदर्शनाचार्य जी महाराज ने एक वाक्य भक्तो को दिया कि भाव में ही भाव मेरा। श्रीसंप्रदाय में सामाजिक समता का भाव है। श्रीसंप्रदाय में ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने कहा कि कलियुग में नाम की महिमा सबसे अधिक है। भगवान ने सभी साधनों में नाम का साधन सर्वश्रेष्ठ बताया है। ईश्वर का नाम गुरु मंत्र का जाप करते रहना सीखना ही दीक्षा है। उन्होंने कहा कि भगवान के नाम का यज्ञ किया गया। शंख-चक्र चिह्न लगाए गए। भगवान के नाम का मंत्र भी प्राप्त किया। मानवता के कार्य करते हुए ईश्वर का नाम जाप करना चाहिए। लेकिन दीक्षा के बाद अब खान-पान में पूर्ण सात्विकता (शुद्धता) आवश्यक है। स्वयं के लिए रुचिकर भोजन सबसे पहले भगवान भोग करना आवश्यक है। सेवा का भाव को दृढ़ता से स्वीकार करे। इस अवसर पर श्रद्धालुगण आनंद और उत्साह के साथ सेवा कार्यो में लगे रहे। इस अवसर पर भजनो से बने आध्यात्मिक वातावरण से श्रद्धालुगण आनंदित रहे।

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