अमरीका से भारत के लोकतंत्र पर हमला, राहुल गांधी की सामन्तवादी हताशा का प्रतीक: प्रो. विधु रावल

राहुल गांधी ने अमेरिका की प्रतिष्ठित ब्राउन यूनिवर्सिटी में भारत के निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाये हैं। यह कोई पहली घटना नहीं है जब उन्होंने विदेशी धरती पर भारत की संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया हो। यह प्रवृत्ति अब एक आदत का रूप ले चुकी है, जो उनकी भारत-विरोधी मानसिकता, सामंती सोच और राजनीतिक हताशा को स्पष्ट रूप से उजागर करती है।

भारत के लोकतंत्र की जड़ें जितनी गहरी हैं, राहुल गांधी की समझ उतनी ही उथली प्रतीत होती है। एक ऐसे व्यक्ति के मुंह से लोकतंत्र और निष्पक्षता पर व्याख्यान सुनना, जो नेशनल हेराल्ड जैसे गंभीर घोटाले में अपनी मां सोनिया गांधी के साथ मुख्य आरोपी हो और 50 हजार के निजी मुचलके पर जमानत पर हो, यह नैतिक पतन का चरम है। जिस देश की न्याय व्यवस्था ने उन्हें अपने अधिकारों की रक्षा का अवसर दिया, उसी देश की संस्थाओं पर सवाल उठाकर वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं।

राहुल गांधी का यह आचरण कोई नई बात नहीं है। 2017 में अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय में उन्होंने “भारत में लोकतंत्र खतरे में है” की ओछी टिप्पणी की थी। 2019 में लंदन में भारत को “असहिष्णु” बताकर उन्होंने देश की छवि को धूमिल किया। 2021 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में “संस्थाओं को कुचला जा रहा है।” का पुराना राग अलापा था। 2023 में लंदन उन्होंने पश्चिमी ताकतों से भारत के लोकतंत्र में हस्तक्षेप करने की कुत्सित अपील की थी। ये सभी बयान न केवल भारत के लोकतंत्र को अपमानित करते हैं, बल्कि विदेशी ताकतों को भारत के खिलाफ वैचारिक हथियार भी सौंपते हैं। यह प्रवृत्ति एक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि यह देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता पर प्रत्यक्ष प्रहार है।

2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 240 सीटें और कांग्रेस को 99 सीटें मिलीं। यह परिणाम भी दिखाता है कि भारत का निर्वाचन आयोग पूर्णतः निष्पक्ष और सक्षम संस्था है। अगर आयोग पक्षपाती होता, तो क्या कांग्रेस को इतनी सीटें मिलतीं? लेकिन राहुल गांधी ने न केवल चुनाव परिणाम को अपनी “जीत” बताया, बल्कि निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया। यद्यपि हार के बावजूद जश्न मनाना, उनकी वास्तविकता से कट चुकी मानसिकता और कुंठा का प्रतिबिंब है।

राहुल गांधी की राजनीतिक सोच अब भी उस सामंती मानसिकता में जकड़ी है, जो यह मानती है कि केवल वंशवाद ही सत्ता की सीढ़ी है। उनका विश्वास जनता के समर्थन पर नहीं, बल्कि परिवारवाद और विशेषाधिकारों पर टिका हुआ है। परंतु भारत की जागरूक जनता अब इस भ्रम को बार-बार तोड़ चुकी है। विदेशी मंचों पर देश को बदनाम करना, उनकी राजनीतिक दिवालियापन और नैतिक दरिद्रता को दर्शाता है।

आज जब मोदी जी के नेतृत्व में भारत विश्व मंच पर सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है, वैश्विक नेतृत्व की दिशा में अग्रसर है, तब राहुल गांधी जैसे नेता अपनी बयानबाजियों से देश की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं। भारत का लोकतंत्र न केवल विश्व में सबसे बड़ा है, बल्कि सबसे परिपक्व और जीवंत भी है। इसकी संस्थाएं इतनी सशक्त हैं कि वे किसी भी आलोचना या कुंठा-जनित हमले से प्रभावित नहीं होंगी।

यह समय है कि राहुल गांधी आत्ममंथन करें कि क्या वे विपक्ष की राजनीति कर रहे हैं या विरोध के नाम पर भारत की गरिमा को ठेस पहुँचा रहे हैं? भारतीय लोकतंत्र और जनता की शक्ति ही इस देश को “विश्व गुरु” बनाएगी, न कि वे निकृष्ठ नेता जो विदेशी मंचों पर अपने देश को ही कटघरे में खड़ा करते हैं।

भारत अब बदल चुका है। यहाँ की जनता सजग है, संवेदनशील है और राष्ट्र के मान-सम्मान से कोई समझौता नहीं करेगी। राहुल गांधी को यह समझना होगा कि देश की आलोचना विदेश में करने से वे न तो बड़े नेता बनेंगे, न ही उन्हें जनता का विश्वास मिलेगा। मोदी युग में भारत का जनमानस जागृत है, जो भारत को 2047 तक विकसित होता देखना चाहता है और वह किसी भी आंतरिक या बाहरी प्रहार से विचलित नहीं होगी।

लेखक भाजपा प्रवक्ता हैं

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