समग्र मानवता का कल्याण ही श्रीसंप्रदाय का मूलभाव : स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य महाराज
अध्यात्मामिक चेतना से सराबोर रहा श्रीलक्ष्मीनारायण दिव्यधाम में आयोजित श्रीसंप्रदाय का दीक्षांत समारोह
फरीदाबाद। सूरजकुंड मार्ग स्थित श्रीरामानुज संप्रदाय की इंद्रप्रस्थ एवं हरियाणा तीर्थपीठ श्रीलक्ष्मीनारायण दिव्यधाम-श्री सिद्धदाता आश्रम में गुरुवार को दीक्षांत समारोह आयोजित किया गया। इसमें दिल्ली-एनसीआर के अलवा हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तर-प्रदेश, हिमाचल, उत्तराखंड और कुछ विदेश से आए करीब 210 श्रद्धालुओं ने दीक्षा प्राप्त कर ईश्वर के प्रति शरणागति का मार्ग स्वीकार किया। श्रीरामानुज संप्रदाय की इंद्रप्रस्थ एवं हरियाणा तीर्थपीठ के पीठाधीश्वर अनंतश्री विभूषित श्रीमद जगदगुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्रीपुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने दीक्षांत समरोह में आए भक्तो को एक-एक कर दीक्षित किया और सभी दीक्षित भक्तों को अपनत्व के भाव से स्वीकार किया। सबसे पहले हवन-यज्ञ के साथ सभी भक्तो को श्रीरामानुज संप्रदाय के अनिवार्य पंच दीक्षा संस्कार कराए।
इसमें सबसे पहले सभी नव दीक्षार्थियों को यज्ञ, यज्ञोपवीत, शंख-चक्र धारण करवाया गया और उनका नया आध्यात्मिक नामकरण किया गया। ताप संस्कार अर्थात श्रीसदगुरुदेव ने भक्तो के शरीर पर श्रीसंप्रदाय के चिह्न शंख-चक्र के तप्त चिह्न धारण कराए। फिर पुंड्र संस्कार अर्थात उध्र्व-पुंड्र का विशेष तिलक लगाना सिखाया। इसके बाद मंत्र संस्कार अर्थात सभी भक्तो के कान में एक मूल रहस्य मंत्र की दीक्षा प्रदान करते हुए जाप की विधि बताते हुए नाम दान संस्कार पूर्ण किया। इस अवसर पर श्रीरामानुज संप्रदाय की इंद्रप्रस्थ एवं हरियाणा तीर्थपीठ के पीठाधीश्वर अनंतश्री विभूषित श्रीमद जगदगुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्रीपुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने रामानुज(श्री) संप्रदाय के विषय में विस्तृत रूप से बताते हुए कहा कि इस संप्रदाय का मूलभाव ही सामाजिक समरसता है।
स्वामी श्रीरामानुजाचार्य का संदेश है कि भक्ति में भेद नहीं, समाज में द्वेष नहीं। इसलिए उन्हें सामाजिक समरसता के प्रणेता माना जाता है। समाज के अंतिम व्यक्ति का कल्याण ही संप्रदाय की मूल चेतना है। दीचांत समारोह व्यक्ति के जीवन में बड़ा दिन है क्योकि जब परमात्मा से जुडऩे के लिए व्यक्ति गुरु धारण करता है तो निश्चित ही यह दिन बड़ा है। उन्होंने दिव्यधाम के संस्थापक वैकुंठवासी सदगुरूदेव स्वामी सुदर्शनाचार्य जी महाराज को याद करते हुए कहा कि उन्होंने एक वाक्य भक्तो को दिया कि भाव में ही भाव मेरा। उन्होंने कहा कि कलयुग में नाम की महिमा सबसे अधिक है। शास्त्रों में सभी साधनों में नाम का साधन सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। मानवता के कार्य करते हुए ईश्वर का नाम जपो और दीक्षा के बाद अब खान-पान में पूर्ण सात्विकता आवश्यक है। इस अवसर पर संगीतमयी भजनो से भावुक श्रद्धालुगण गुरु कृपा से सराबोर रहे। सभी ने श्रीसदगुरुदेव से आशीर्वाद और भोजन प्रसाद प्राप्त किया।
