श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का तात्त्विक मर्म ही जीवात्मा से परमात्मा का मिलन : स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य

भक्ति और शरणागति का महोत्सव में सिद्धदाता आश्रम आध्यात्मिक छटा से सराबोर रहा

फरीदाबाद। सूरजकुंड मार्ग स्थित श्रीलक्ष्मी नारायण दिव्यधाम-श्रीसिद्धदाता आश्रम में आयोजित किया गया श्रीकृष्ण जन्मष्टामी महोत्सव भक्तो की आस्था, उमंग और श्रद्धा से सराबोर रहा। यहां शुक्रवार की सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी-लंबी कतार भगवान के दर्शन के लिए लगनी शुरु हो गई। आश्रम परिसर में मनमोहक सुंदर झांकिया, मंत्रमुग्ध कर देने वाले  सांस्कृतिक कार्यक्रम देर रात में भगवान के जन्म होने तक जारी रहे। आश्रम में भी भक्तो के लिए विशेष प्रसाद की व्यस्था की गई। आश्रम के अधिष्ठाता और श्रीरामानुज संप्रदाय की तीर्थपीठ इंद्रप्रस्थ एवं हरियाणा पीठाधीश्वर अनंतश्री विभूषित श्रीमद जगतगुरु रामानुजाचार्य स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज के सान्निध्य में देर रात में जन्म के समय भगवान का अभिषेक किया गया।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों में …जन्में हैं कृष्ण कन्हाई गोकुल में देखो बाजे बधाई जैसे भजनों पर श्रद्धालुगण देर रात में झूमते रहे। मंदिर में सभी देव दरबारों को सुंदर फूलों से सजाया गया। स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने देर रात अपने प्रवचन में कहा कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महापर्व पर श्रद्धालुओं के लिए एक अत्यंत दिव्य संदेश यही है कि भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य ने प्रत्यक्ष रूप से विशिष्टाद्वैत मार्ग और शरणागति के सिद्धांत को सिद्ध किया है। भगवान श्रीविष्णु हरि के अवतार के रूप में श्रीकृष्ण का इस धरा पर पूर्ण अवतार रूप में अवतरित हुए। भगवान श्रीकृष्ण का अवतार केवल कंस जैसे असुरों के संहार के लिए ही नहीं हुआ, असुरों का संहार तो भगवान के संकल्प मात्र से ही हो सकता है।

लेकिन भगवान के अवतार का मुख्य प्रयोजन-परित्राणाय साधूनां, अर्थात् अपने अनन्य भक्तों की रक्षा करना, उन्हें अपनी दिव्य लीलाओं का रस प्रदान करना और संसार के सम्मुख शरणागति का सबसे सुगम मार्ग प्रस्तुत करना रहा। भगवान श्रीकृष्ण अवतार परम तत्व का सबसे माधुर्य और वात्सल्य से परिपूर्ण विभव स्वरूप हैं। गोकुल की गलियों में जब वही चराचर जगत के स्वामी यशोदा मैया के प्रेम के बंधन में बंध जाते हैं, तो वह ईश्वर की ‘सौशिल्य’ और ‘सौलभ्य’ (आसानी से प्राप्त होने का गुण) पराकाष्ठा होती है। जहाँ ज्ञान और वैराग्य से भी ऊपर ‘भक्ति’ और ‘प्रेम’ को दिखाता है। जबकि महाभारत के युद्ध क्षेत्र में जब अर्जुन विषाद से घिर गए, तब भगवान ने उन्हें भगवद्गीता का दिव्य उपदेश दिया। भगवान कहते हैं कि सभी प्रकार के साधनों और आश्रयों को छोडक़र केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों और बंधनों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो। यही ‘प्रपत्ति’ है। भगवान कृष्ण अर्जुन के सारथि बने, जिसका अर्थ है कि जब जीवात्मा अपना जीवन रथ भगवान को सौंप देती है, तो भवसागर को पार करना अत्यंत सरल हो जाता है।

सिद्धदाता आश्रम की यह पावन भूमि गुरु-कृपा और नारायण-भक्ति का जीवंत केंद्र है। यहां संकल्प लेना चाहिए कि अपने अहंकार, काम, क्रोध और मोह को भगवान के चरणों में समर्पित कर दें। देर रात देवकी नंदन का जन्म हुआ। तो आश्रम परिसर में घंटे घडियाल बजने शुरू हो गए। श्रीलक्ष्मीनारायण दिव्यधाम में स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने दूध, दही, शुद्ध धी, शहद, पवित्र नदियों के जल, नारियल जल और फूलों से भगवान का अभिषेक किया। श्रद्धालुगण कृष्णभावनामृत के दिव्य आनंद से सराबोर हो गए। …हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैयालाल की,…नंद के आनंद भयो जय कन्हैयालाल की जैसे जयकारों की गूंज रही। भगवान को आकर्षक पौशाक पहनाकर तुलसी और मक्खन मिश्री का भोग अर्पित किए गए। इसके बाद कान्हा को झूले में झूलाकर पुष्पवर्षा की गई। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं पर आधारित झांकियों के दर्शन कर परिवार एवं समाज के सुख-समृद्धि और मंगल की प्रार्थना की तथा प्रसाद ग्रहण कर अपने गंतव्य के लिए प्रस्थान किया।

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