श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के साख्ययोग एवं योग विज्ञान विभाग द्वारा आयोजित NET / GRF (कनिष्ठ अध्येतावृत्ति) परीक्षा हेतु नि:शुक्ल कक्षाओं के उद्धाटन के विशेष सत्र में मुख्यअतिथि के रूप में उपस्थित स्वामी भंते महेन्द्र जी, भंते भदन्त ज्ञानेश्वर, बुद्ध विहार, कुशीनगर उत्तर प्रदेश,ने अपने वक्तव्य में कहा की भगवान बुद्ध के सिद्धांतों से ही विश्व में शांति सम्भव है। भगवान बुद्ध ने चार आर्य सत्यों की चर्चा की जिसमें सम्यक दृष्टि- वास्तविकता को सही रूप में समझना। सम्यक संकल्प-सही और शुद्ध विचार रखना।
अहिंसा, त्याग और करुणा का भाव रखना। सम्यक वाणी- सत्य बोलना, मधुर बोलना और झूठ, चुगली तथा कठोर वचन से बचना। सम्यक कर्म- अच्छे और नैतिक कर्म करना और हिंसा, चोरी और अनैतिक आचरण से दूर रहना। सम्यक आजीव- ऐसी आजीविका अपनाना जिससे किसी प्राणी को हानि न हो और जो नैतिक हो। सम्यक व्यायाम-मन में उत्पन्न बुरे विचारों को रोकना और अच्छे विचारों को विकसित करने का प्रयास करना। सम्यक स्मृति- मन को जागरूक और सजग रखना, अपने विचारों, कर्मों और भावनाओं पर ध्यान रखना।
सम्यक समाधि- मन को एकाग्र कर ध्यान में स्थिर करना, जिससे मानसिक शांति और ज्ञान प्राप्त होता है इन्ही सिद्धांतों के आधार पर आज विश्व मे शांति स्थापित हो सकती है। इसलिए आवश्यक है की हम इनको अपने जीवन मे अपनाए । कार्यक्रम के निर्देशक एवं कुलगुरु माननीय कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक जी ने अपना आशीर्वाद एवं शुभकामनाए प्रेषित की। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. अनेकांत जैन, अध्यक्ष- दर्शन पीठ प्रमुख ने की और कहा महावीर स्वामी और भगबन बुद्ध ने विश्व को शांति का संदेश दिया।
कार्यक्रम के संयोजक प्रो.मारकण्डेय नाथ तिवारी, विभागाध्यक्ष (सांख्ययोग एवं योग विज्ञान)ने कहा की भगवान बुद्ध ने कहा “आप्प दीप भव:” अपने दीपक खुद बनो अर्थरत् यह शिक्षा आत्म-निर्भरता, आत्म-ज्ञान और स्वयं के आचरण को सुधारने और सत्य की खोज और मार्गदर्शन के लिए किसी बाहरी सहारे की अपेक्षा स्वयं पर विश्वास करना के लिए बताई गई थी।
कार्यक्रम के समन्वयक:- डॉ. रमेश कुमार, सहायक आचार्य, समन्वयक – योग विज्ञान विभाग थे। इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रो. के. अनंता, डॉ. विजय गुसाई, आचार्य लेखराज सिंह, आचार्य रोहित कुमार, डॉ विनय गोपाल आदि गणमान्य लोग मौजूद रहे। आए हुए सभी विद्वानों का वाचिक स्वागत डॉ नवदीप जोशी जी द्वारा किया गया एवं कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. हरि राम मीणा सहायक आचार्य द्वारा किया गया।
