बेनतीजा शांति-वार्ता ने उतारा पाकिस्तान की औपनिवेशिक दलाली का मुखौटा !

प्रो. विधु रावल

कांग्रेस इकोसिस्टम के हताश और पूर्वाग्रह से ग्रस्त मोदी-विरोधी विश्लेषक कुछ दिनों से पाकिस्तान की प्रशंसा में डूबे हुए थे। वे चिल्ला रहे थे कि देखो, पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह का युद्धविराम करा दिया, इस्लामाबाद में समझौते का मार्ग प्रशस्त कर दिया और पाकिस्तान दुनिया का शांति-सेवक बनकर उभर आया। लेकिन अब सच्चाई सामने आ चुकी है। पाकिस्तान में हुई शांतिवार्ता पूरी तरह बेनतीजा रही। इस्लामाबाद में घंटों चली मैराथन वार्ता के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे डी वैंस ने स्पष्ट घोषणा की कि ईरान ने अमेरिकी शर्तें स्वीकार नहीं कीं और कोई समझौता नहीं हो सका। ईरानी पक्ष ने भी प्रमुख मुद्दों पर गहरी खाई की बात कही। दो सप्ताह का नाजुक युद्धविराम अब अनिश्चितता के साए में लटक गया है। दोनों पक्ष फिर से हथियार संग्रह और पुनर्संगठन कर रहे हैं। ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर पूर्ण नौसैनिक नाकाबंदी की धमकी दे दी है। यह नाकामी पाकिस्तान की कथित कूटनीतिक जीत को खोखला साबित कर रही है।

लेकिन आंखों पर पट्टी बंधे पाकिस्तान-प्रेमी व मोदी-विरोधी विश्लेषकों को इतिहास की कड़वी सच्चाई और भूराजनीति की गहराई समझने की सख्त जरूरत है। पाकिस्तान कोई कूटनीतिक महानायक नहीं है। बल्कि वह पश्चिमी शक्तियों द्वारा सदियों से रची गई एक पुरानी साजिश का जीवित प्रमाण है। पाकिस्तान उस ब्रिटिश कचरे का हिस्सा जिसे 1947 में अखंड भारत से अलग करके एक विस्तारित महाखेल का सस्ता और उपयोगी मोहरा बनाया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद थकान और कमजोरी से जूझ रही ब्रिटेन ने भारत का विभाजन जल्दबाजी में थोप दिया। इसका मकसद केवल धार्मिक विभाजन नहीं था, बल्कि एक कमजोर, मुस्लिम-बहुल बफर राज्य गढ़ना था, जिसे आसानी से नियंत्रित करके सोवियत विरोधी और पश्चिमी हितों का रखवाला बनाया जा सके। ब्रिटेन और रूस के बीच मध्य एशिया पर छिड़ी ये पुरानी प्रतिस्पर्धा महाखेल के नाम से इतिहास में दर्ज है। एक मजबूत, एकीकृत भारत कभी हिंद महासागर पर अपना प्रभुत्व स्थापित न कर पाए, यही सोच थी। पाकिस्तान को अफगानिस्तान और सोवियत प्रभाव के खिलाफ दीवार के रूप में देखा गया। ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे पश्चिम एशिया के तेल क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए उत्तरी ढाल माना। विभाजन की त्रासदी सामरिक जरूरतों की उपज थी, न कि केवल समुदायों की इच्छा।

क्या पाकिस्तान ने जो कुछ किया, वह स्वेच्छा से किया? क्या कोई सम्मानजनक राष्ट्र ऐसा दलाली का काम अपने आप उठाना चाहेगा? कोई नहीं। तीसरी दुनिया के देश कहा जाने वाला पाकिस्तान तो वैसे भी अत्यंत पिछड़ा है। जब अमेरिका को अपनी रिफाइनरी बनानी थी तो उसने भारत को चुना। जब अमेरिका के उद्योगपतियों को अपने फोन बनाने थे तो फिर भारत को ही साथ लिया। जापान, यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया समेत सभी विकसित राष्ट्र प्रगति के लिए भारत को ही चुनते हैं। भारत की नैतिकता, विश्वसनीयता और स्थिरता उन्हें आकर्षित करती है। पर जब मनमर्ज़ी की युद्धविराम वार्ता करानी थी तो पाकिस्तान चुना गया, भारत नहीं। क्योंकि यह वार्ता सुलह है ही नहीं, बल्कि एक बड़े युद्ध से भागने का बहाना है। अमेरिका में इस युद्ध के विरोध में चलते प्रदर्शन, ईरान का प्रतिरोध और मध्य पूर्व के देशों को हो रहा भारी नुकसान, इन सब से परेशान अमेरिका युद्ध से निकलने का रास्ता ढूंढ रहा था। इन अनैतिक कर्मों में कोई सम्मानजनक देश अमेरिका का साथ देना नहीं चाहता था, सिवाय एक अनैतिक देश पाकिस्तान के, जिसका बौद्धिक विकास 1947 में ही रुक गया था। वह देश जिसके कठपुतली प्रधानमंत्री ड्राफ्ट संदेश तक को ठीक से समझ नहीं पाते, उससे इतने बड़े युद्ध को रोकने का श्रेय कैसे दिया जा सकता है? अब तो यही करतब भी धूल में मिल गया है। शांतिवार्ता की नाकामी ने साफ कर दिया कि पाकिस्तान केवल अस्थायी ठहराव का माध्यम बन सका, स्थायी शांति का नहीं। दोनों पक्ष फिर से तैयार हो रहे हैं, तनाव बढ़ रहा है और क्षेत्रीय अस्थिरता गहरा रही है।
पाकिस्तान की यह भूमिका कोई आकस्मिक चमत्कार नहीं। 1971 में यही पाकिस्तान चीन-अमेरिका के बीच निकटता का गुप्त चैनल बना रहा था। अमरीकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर का रहस्यमयी दौरा इस्लामाबाद से बीजिंग तक पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या खान की मदद से संपन्न हुआ। पाकिस्तान ने दोनों पक्षों के बीच संदेश पहुंचाए और अपने विमान से किसिंजर को बीजिंग पहुंचाया। यह कदम बाद में अमरीका के राष्ट्रपति निक्सन के ऐतिहासिक चीन दौरे का आधार बना, जो सोवियत संघ को घेरने की बड़ी रणनीति का हिस्सा था। ठीक उसी तरह अस्सी के दशक में पाकिस्तान अमेरिका की शह पर सोवियत-अफगान युद्ध में मुजाहिदीनों को हथियार पहुंचाने का प्रमुख केंद्र बना। सीआईए का सबसे बड़ा गुप्त अभियान पाकिस्तानी धरती से संचालित हुआ। बाद में तालिबान के खिलाफ लड़ाई का नाटकीय रोल भी निभाया गया। 1979 से अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिशें भी समय-समय पर चलती रहीं। अब ईरान के खिलाफ इजराइल-अमेरिका युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने दो सप्ताह का युद्धविराम प्रस्तावित किया था, लेकिन उसकी वार्ता पूरी तरह विफल रही। यह पाकिस्तान की कोई नई उपलब्धि नहीं, बल्कि उसका स्थायी पेशा है।

पाकिस्तान ब्रिटिश निर्मित एक औपनिवेशिक मोहरा है जिसे महाशक्तियां अपनी सुविधा और हित के अनुसार इस्तेमाल करती रहती हैं। उसकी भौगोलिक स्थिति, ईरान की सीमा, आपूर्ति मार्ग और चीन की परियोजनाएं, इसे सुलभ बनाती है, लेकिन स्वतंत्र निर्णय लेने की एजेंसी कभी नहीं देती। कांग्रेस इकोसिस्टम के फर्जी विश्लेषक इसे सामरिक क्षमता बता कर छाती कूट रहे थे और चूड़ियाँ तोड़ रहे थे, जबकि सच्चाई में पाकिस्तान केवल एक औपनिवेशिक अवशेष की है। हम इस मोहरे पर तरस खाते हैं, ईर्ष्या नहीं करते। हम जानते हैं कि यह उसकी नियति है। शांतिवार्ता की नाकामी ने इस नियति को और उजागर कर दिया कि पाकिस्तान केवल अस्थायी ठहराव ला सकता है, लेकिन गहरी खाइयों को पाट नहीं सकता। अब असली मुद्दा भारत की सामरिक स्थिति का है। कांग्रेस के हताश आलोचक मोदी-विरोध की आंधी में भारत को कमजोर और असहाय आंकते रहते हैं, लेकिन तथ्य और इतिहास उलट गवाही देते हैं। इंदिरा गांधी के दौर में भारत गैर-संरेखण की नीति पर चलने का दावा करता था, लेकिन वास्तव में भारत का स्पष्ट झुकाव सोवियत यूनियन की तरफ़ था। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में अमेरिका और चीन ने पाकिस्तान का साथ दिया और भारत को घेरने की कोशिश की। इंदिरा को सोवियत समर्थन मिला, लेकिन विकल्प बेहद सीमित थे। अर्थव्यवस्था कमजोर थी, सैन्य क्षमता सीमित थी और अंतरराष्ट्रीय अलगाव का खतरा सिर पर मंडराता था।

नरेंद्र मोदी के दृढ़ नेतृत्व में भारत बहु-संरेखित विदेश नीति अपनाकर कहीं आगे निकल चुका है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत सक्रिय भागीदारी, रूस से आधुनिक हथियार और ऊर्जा संसाधन, अमेरिका के साथ प्रौद्योगिकी और रक्षा सहयोग, यूरोप और मध्य पूर्व के साथ संतुलित संबंध, भारत की सामरिक स्वायत्तता का एक नया और शक्तिशाली स्वरूप है। मोदी की सूक्ष्म और दूरदर्शी कूटनीति ने भारत को विश्व मंच पर सम्मानजनक स्थान दिलाया है, जहां हम दलाली नहीं करते, बल्कि स्वतंत्र और आत्मनिर्भर फैसले लेते हैं। हमारा देश भारत किसी पाकिस्तान की तरह कोई प्यादा नहीं है। हम विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। हमारा प्रयोग एक उत्प्रेरक के रूप में नहीं हो सकता।

तथ्यों से स्पष्ट है कि आज भारत इंदिरा युग से कहीं मजबूत और बेहतर स्थिति में है। इंदिरा काल में अर्थव्यवस्था बहुत छोटी थी, आज भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जो सैन्य आधुनिकीकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा का मजबूत आधार प्रदान करती है। ऑपरेशन सिंदूर जैसे साहसिक अभियानों और हाल की घटनाओं में पाकिस्तान की परमाणु धमकी को सीधे चुनौती दी गई, जो इंदिरा के समय असंभव था। रूस-यूक्रेन जैसे वैश्विक संकटों में भारत ने बिना किसी खेमे में फंसे दोनों पक्षों से संतुलन बनाए रखा। पड़ोसियों के साथ सक्रिय नीतियां क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाती हैं, जबकि पाकिस्तान चीन की गिरफ्त में जकड़ा हुआ है।

मोदी की नीति ने भारत को महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाने की परिपक्व सामरिक क्षमता और अपने राष्ट्रीय हितों की अटूट रक्षा प्रदान की है। पाकिस्तान अभी भी सस्ता मध्यस्थ बना हुआ है, जबकि भारत एक उभरती हुई शक्ति है जो अपना खेल खुद तय करता है और दूसरों को तय नहीं होने देता। कांग्रेस के ये स्वयंभू विश्लेषक इतिहास की किताबें नहीं खोलते। वे पाकिस्तान को शांति-सेवक कहकर मोदी-विरोध का पुराना खेल खेल रहे थे, लेकिन शांतिवार्ता की नाकामी ने उनका मुखौटा खींच लिया है। सच्चे भारतीय जानते हैं कि भारत उस पुराने औपनिवेशिक खेल से बहुत ऊपर उठ चुका है। हम औपनिवेशिक अवशेषों का जश्न नहीं मनाते। हम अपनी प्राचीन सभ्यतागत शक्ति, राष्ट्रीय एकता और मोदी की दूरदर्शी कूटनीति पर गर्व करते हैं। पाकिस्तान की दलाली और उसकी वार्ताओं की विफलता उसकी नियति है जबकि भारत की स्वायत्तता, अद्वित्य क्षमता और अभूतपूर्व गरिमा भारत को वैश्विक महाशक्ति बनाने की ओर अग्रसर कर रही है। [लेखक भाजपा प्रवक्ता हैं]

आज भले ही पाकिस्तान खुद को अमेरिका-ईरान के हिंसक तनाव में संदेशवाहक और मध्यस्थ प्रस्तुत कर रहा था। लेकिन क्या यह उसकी कोई असाधारण कूटनीतिक क्षमता का परिणाम था? बिल्कुल नहीं। बल्कि यह स्थिति पाकिस्तान की सदियों से निर्मित और पोषित कमजोरी का नतीजा है। ईरान से सीमा साझा करने वाला, अमेरिकी आपूर्ति मार्गों का ठेकेदार, चीन की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर बैठा और इस्लामी दुनिया का हितरक्षक बनने का दावा करने वाला पाकिस्तान महाशक्तियों के लिए बिना किसी जोखिम के इस्तेमाल करने लायक सस्ता मध्यस्थ है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ठीक कहा था कि भारत पाकिस्तान जैसा दलाल राष्ट्र नहीं है। हम दलाली नहीं करते। हम अपनी गरिमा और स्वायत्तता के साथ खड़े रहते हैं।

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