महर्षि दयानंद ने कहां “वेदों की ओर लौटो”: प्रो. मुरली मनोहर पाठक
योग विज्ञान विभाग एवं सांख्ययोग विभाग श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी महर्षि दयानंद सरस्वती की 201वीं जयंती के उपलक्ष्य में दिनांक 12 फरवरी 2026 को आयोजित की गई जिसका आयोजन विश्वविद्यालय के वाचस्पति सभागार में किया गया। कार्यक्रम माननीय कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक जी के द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ प्रारंभ किया गया जिसमें माननीय कुलपति जी ने अपने वक्तव्य मे कहा की महर्षि दयानंद का जन्म प्राणी मात्र के कल्याण और वेद ज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए हुआ था, इसलिए उन्होंने कहा “वेदों की ओर लौटो” लेकिन वेदों की ओर लौटने का तात्पर्य केवल वेद के मंत्रों का पाठ करना नहीं अपितु वेद के मंत्रों में निहित ज्ञान को जीवन में धारण कर उसका पालन करने से है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. रामप्रकाश दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि महर्षि दयानंद युग दृष्टा थे उन्होंने समाज के अंदर अनेक बुराइयों का निराकरण किया और एक सभ्य समाज की स्थापना की। विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे प्रो. भारत भूषण जी, अध्यक्ष- ज्योतिष विभाग, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा की स्वामी दयानंद एक महान शिक्षाविद एवं समाज सुधारक थे।
मुख्य वक्ता के रूप में पधारे आचार्य योगेश, प्राचार्य- गुरुकुल महाविद्यालय गौतम नगर ने कहा कि स्वामी दयानंद ने कहा था कि इस देश को यदि पुन: विश्व गुरु और सोने की चिड़िया बनाना है तो वेद मार्ग पर ही चलना होगा, आत्म संयम, ब्रह्मचर्य जीवन, ईश्वर के प्रति विश्वास, दृड संकल्प और अखंड प्रचंड पुरुषार्थ करना होगा तभी यह भारत पुन: विश्व गुरु बन पाएगा कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. मारकण्डेय नाथ तिवारी ने कहा की लोगों के आत्म उत्थान देश के प्रति स्वाभिमान अपने ऋषियों के ज्ञान के प्रति सम्मान के लिए दयानंद ने अनेक प्रयास किए।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. रमेश कुमार ने कहा की स्वामी दयानंद सरस्वती कहते थे कि राष्ट्र उत्थान के लिए ब्रह्मचर्य पालन महत्वपूर्ण औषधि है जिस समाज में लोग ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले होंगे तो वह समाज अपने अस्तित्व को पुनः प्राप्त कर लेगा अर्थात् पुनः विश्व गुरु बनेगा। जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन अत्यंत आवश्यक है ब्रह्मचर्य के पालन का तात्पर्य- ईश्वर उपासना, आत्म संयम, इंद्रिय संयम, त्याग की भावना, वैराग्य की भावना से परिपूर्ण होना है। जिससे हमें आत्मिक-आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त कर अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. जयसिंह भढ़िया ने सभी महानुभावों का धन्यवाद ज्ञापन किया। इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से डॉ. विजय गुसाई, डॉ. लेखराज सिंह, डॉ. राजेश कुमार, डॉ. मोहन लाल शर्मा, डॉ. पीताम्बर, डॉ. बलबीर सिंह, श्रीमती प्रियंका पाण्डेय, डॉ. योगेश शर्मा आदि गणमान्य लोग मौजूद रहे।
