“विवेकानंद रॉक मेमोरियल स्मारक कन्याकुमारी”
धैर्य,दृढ़ संकल्प व संघर्ष की प्रेरणादायक गाथा
मानव परिवार फरीदाबाद की घुमक्कड़ टूर मंडली ने अभी हाल में केरल राज्य के कई खूबसूरत शहरों व एतिहासिक जगहों की यात्रा की। विवेकानंद रॉक मेमोरियल स्मारक कन्याकुमारी भी यात्रा का एक हिस्सा रहा। इस एतिहासिक व शानदार मेमोरियल के इतिहास,संघर्ष, धैर्य और दृढ़ संकल्प की जो गाथा व कहानी सुनने व देखने को मिली उसका विवरण इस लेख के द्वारा सभी की जानकारी में साझा किया जा रहा है। स्वामी विवेकानंद- एक निःस्वार्थ संन्यासी भारत की एकता व अखंडता,प्राचीन संस्कृति को जीवित रखने के लिए गाँव-गाँव जाकर लोगों को शिक्षित कर रहे थे और अंतिम व्यक्ति तक सभी की स्थिति बेहतर बनाने के लिए विभिन्न तरीकों से प्रयास कर रहे थे।
भारत के कायाकल्प के लिए स्वामी विवेकानंद का मिशन तब शुरू हुआ जब उन्होंने भारत के अंतिम भाग कन्याकुमारी में तीन समुद्रों के संगम के बीच में स्थित एक चट्टान पर तपस्या व ध्यान साधना की और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का एक स्वप्न देखा।
उस सपने को पूरा करने के लिए हिन्दू समाज की राय बनी कि
जिस चट्टान पर बैठकर विवेकानंद जी ने भारत की एकता,अखंडता व प्राचीन संस्कृति को जीवित रखने का संकल्प लिया उस सिला/चट्टान पर विवेकानंद जी की सुंदर व विशालकाय आदमकद मूर्ति स्थापित की जाए। संकल्प तो ले लिया गया पर उसको पूरा करने में बहुत सी बाधाओं व परेशानियों का सामना करना पड़ा। इस मिशन को पूरा करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह एकनाथ रानडे ने विशेष कार्य किया। सन 1963 में विवेकानन्द जन्मशताब्दी समारोह तमिलनाडु में तीन समुद्रों के संगम के बीच में स्थित एक चट्टान का नाम विवेकानन्द शिला रखने और उस पर स्वामी जी की एक प्रतिमा स्थापित करने का प्रस्ताव पारित हुआ। इसको लेकर कन्याकुमारी के हिन्दुओं में भारी उत्साह हुआ और उन्होंने एक समिति गठित की। स्वामी चिद्भवानन्द भी इस कार्य में जुट गये। इस प्रस्ताव का वहां के गैर हिन्दू समाज ने काफी विरोध किया।उन्होंने मांग की कि शिला का नाम विवेकानन्द शिला की बजाय ‘सेंट जेवियर रॉक’ होना
चाहिए। उन्होंने शिला पर प्रतीक चिन्ह ‘क्रॉस’ की एक प्रतिमा भी स्थापित कर दी।
मतान्तरित ईसाई नाविकों ने हिन्दुओं को समुद्र तट से शिला तक ले जाने से मना कर दिया। पूरे कन्याकुमारी जिले में संघर्ष की तनाव भरी स्थिति पैदा हो गयी। सरकार ने धारा 144 लागू कर दी। स्थिति नियन्त्रण से बाहर होने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने सरकार्यवाह एकनाथ रानडे को सिला पर विवेकानन्द स्मारक का निर्माण कराने का कार्य सौंपा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.भक्तवत्सलम विवेकानन्द स्मारक के निर्माण पक्ष में थे पर केन्द्रीय संस्कृति मंत्री हुमायूं कबीर पर्यावरण आदि का बहाना बनाकर रोड़े अटका रहे थे। रानाडे जी ने विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के सांसदों को अपनी विचारधारा से ऊपर उठकर“भारतीयता विचारधारा” में पिरो दिया और तीन दिन में 323 सांसदों के हस्ताक्षर लेकर तब के गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पास पहुंच गए। जब इतनी बड़ी संख्या में सांसदों ने स्मारक बनने की इच्छा प्रकट की तो संदेश स्पष्ट था कि पूरा देश स्मारक की आकांक्षा करता है। कांग्रेस हो या समाजवादी, साम्यवादी हो या द्रविड़ नेता सभी ने एक स्वर में हामी भरी।
कन्याकुमारी शिला पर निर्मित मन्दिर अनुमति तो मिल गई किन्तु धन कहाँ से आए? एकनाथ रानडे ने हर प्रान्त से सहयोग मांगा चाहे जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला हों या नागालैंड के होकिशे सेमा। सभी ने सहयोग किया। पहला दान “चिन्मय मिशन” के स्वामी रामकृष्ण मठ के अध्यक्ष स्वामी वीरेश्वरानन्द महाराज ने स्मारक को प्रतिष्ठित किया और इसका औपचारिक उद्घाटन 2 सितम्बर 1970 को भारत के राष्ट्रपति श्री वी वी गिरि ने किया। उद्घाटन समारोह लगभग 2 महीने तक चला जिसमें भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी भाग लिया।
समुद्र तट से पचास फुट ऊंचाई पर निर्मित यह भव्य और विशाल कृति विश्व के पर्यटन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण आकर्षण केन्द्र बनकर उभर आई है। इसे बनाने के लिए लगभग 73 हजार विशाल प्रस्तर खण्डों को समुद्र तट पर स्थित कार्यशाला में कलाकृतियों से सज्जित करके समुद्री मार्ग से शिला पर पहुंचाया गया। 2 सितम्बर 1970 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डा.वी.वी. गिरि व तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री करुणानिधि ने इस स्मारक का उद्घाटन किया। आज देश के कोने कोने से लोग इस विवेकानंद रॉक मेमोरियल के दर्शन करने आते हैं। 2024 में नरेंद्र मोदी ने यहाँ ध्यान साधना की जिसने इसे फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया। मानव परिवार की घुमक्कड़ टूर मंडली ने अभी हाल में इस विवेकानंद रॉक मेमोरियल के दर्शन पर जो एक बात देखी उसे देखकर सभी का मन बहुत विचलित हुआ। आज से लगभग 20 साल पहले विवेकानंद जी की बड़ी विशाल प्रतिमा शिलापट पर खुले में होती थी जो दूर से सुंदर व भव्य दिखाई देती थी अब उसके ऊपर गुंबद बना कर उसको चारों ओर से कवर कर दिया है जिसको अंदर जाकर ही देखा जा सकता है। जब कि उसके नजदीक स्थित चट्टान सिला पर कुछ साल पहले स्थापित की गई साउथ के संत जी की मूर्ति को विवेकानंद स्मारक से बहुत बड़ा,विशाल व खुले रूप में बनाया गया है जिसके आगे विवेकानंद जी का स्मारक काफी बोना व छोटा दिखाई देता है। इसे देखकर बहुत दुख हुआ। हमारी नजर में य़ह सब राजनीति के कारण हुआ है।
कैलाश शर्मा
मास्टर ऑफ जर्नलिज्म
स्वतंत्र पत्रकार लेखक व विचारक
