यथार्थ हॉस्पिटल फरीदाबाद ने हाइपर-एक्यूट लिवर फेलियर से जूझ रहे 14 वर्षीय किशोर की बचाई जान
फरीदाबाद : यथार्थ हॉस्पिटल, सेक्टर-20, फरीदाबाद के डॉक्टरों ने हेपेटाइटिस-ए के कारण हुए हाइपर-एक्यूट लिवर फेलियर से पीड़ित 14 वर्षीय किशोर का सफलतापूर्वक उपचार कर उसकी जान बचाई। समय पर इलाज, गहन निगरानी और सुव्यवस्थित उपचार योजना की बदौलत डॉक्टरों ने इस गंभीर और जानलेवा स्थिति पर काबू पाया।
मरीज मानव को लगातार बुखार, बार-बार उल्टी होने और लिवर फंक्शन टेस्ट में गंभीर गड़बड़ी के कारण एक अन्य अस्पताल में पांच दिनों तक उपचार मिलने के बाद यथार्थ हॉस्पिटल, सेक्टर-20, फरीदाबाद रेफर किया गया था। अस्पताल पहुंचने पर उसकी स्थिति बेहद गंभीर थी। उसके लिवर एंजाइम्स का स्तर अत्यधिक बढ़ा हुआ था, पीलिया था, भोजन और तरल पदार्थ लेने की क्षमता काफी कम हो गई थी तथा उसकी चेतना का स्तर भी प्रभावित हो रहा था। जांच में पता चला कि वह हाइपर-एक्यूट लिवर फेलियर और तेजी से बढ़ती हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी से ग्रस्त था। यह ऐसी स्थिति है जिसमें लिवर की गंभीर खराबी के कारण शरीर में विषैले तत्व जमा होकर मस्तिष्क को प्रभावित करने लगते हैं।
इस मामले के बारे में जानकारी देते हुए यथार्थ हॉस्पिटल, सेक्टर-20, फरीदाबाद के पीडियाट्रिक्स विभाग के सीनियर डायरेक्टर डॉ. संजीव दत्ता ने कहा, “जब मानव हमारे अस्पताल पहुंचा, तब उसकी स्थिति अत्यंत गंभीर थी। वह हेपेटाइटिस-ए के कारण हुए हाइपर-एक्यूट लिवर फेलियर और बढ़ती हुई हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी से जूझ रहा था। ऐसे मामलों में तत्काल मल्टीडिसिप्लिनरी इंटरवेंशन की आवश्यकता होती है क्योंकि मरीज की स्थिति बहुत तेजी से बिगड़ सकती है। हमारी टीम ने उसके प्रत्येक क्लिनिकल पैरामीटर की लगातार निगरानी की और लिवर की रिकवरी को बढ़ावा देने तथा कॉम्प्लीकेशन्स को रोकने के उद्देश्य से आक्रामक उपचार शुरू किया। समन्वित देखभाल और निरंतर मूल्यांकन इस कॉम्प्लेक्स मामले के सफल प्रबंधन में बेहद महत्वपूर्ण रहे।”
अस्पताल में भर्ती होते ही बच्चे को पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (PICU) में स्थानांतरित किया गया और एडवांस्ड सपोर्टिव ट्रीटमेंट शुरू किया गया। न्यूरोलॉजिकल स्थिति बिगड़ने के कारण उसे सात दिनों तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा। इसके अलावा रक्त संचार बनाए रखने के लिए आईनोट्रोपिक सपोर्ट, संक्रमण से बचाव हेतु एंटीबायोटिक्स, लिवर की सुरक्षा के लिए विशेष दवाएं, लिवर फेलियर के उपचार में उपयोग होने वाली एन-एसिटाइल सिस्टीन (N-Acetyl Cysteine) थेरेपी, एल्ब्यूमिन इन्फ्यूजन तथा प्लाज्मा एक्सचेंज जैसी प्रक्रियाएं की गईं। शुरुआती दिनों में अपेक्षित सुधार न दिखने पर डॉक्टरों ने जीवनरक्षक लिवर ट्रांसप्लांट की संभावना पर भी विचार किया और इस संबंध में परिवार से चर्चा की।
यथार्थ हॉस्पिटल, सेक्टर-20, फरीदाबाद के पीआईसीयू विभाग की प्रिंसिपल कंसल्टेंट डॉ. सोनाली घोष ने कहा, “बच्चों में एक्यूट लिवर फेलियर का उपचार बेहद चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि उनकी स्थिति बहुत तेजी से बदल सकती है। उपचार के शुरुआती चरण में मानव को वेंटिलेटरी सपोर्ट, लगातार निगरानी और कई प्रकार की ऑर्गन-सपोर्टिव थेरेपी की आवश्यकता पड़ी। हालांकि हम लिवर ट्रांसप्लांट की संभावना के लिए भी तैयारी कर रहे थे, लेकिन साथ ही हमने एक सुनियोजित और निरंतर उपचार रणनीति जारी रखी। अगले कुछ दिनों में उसकी स्थिति धीरे-धीरे स्थिर होने लगी और उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला। आज वह बिना किसी सहायता के सांस ले रहा है, सामान्य रूप से बातचीत कर रहा है और उसके लिवर की कार्यक्षमता लगातार बेहतर हो रही है।”
लगातार 14 दिनों तक चले उपचार और करीबी निगरानी के बाद मानव की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ। वह अब पूरी तरह होश में है, बिना किसी सहायता के सांस ले रहा है, स्वयं भोजन कर रहा है और अपने परिवार के साथ सामान्य रूप से बातचीत कर रहा है। उसके लिवर फंक्शन से जुड़े सभी महत्वपूर्ण पैरामीटर लगातार बेहतर हो रहे हैं, जिसके कारण फिलहाल लिवर ट्रांसप्लांट की आवश्यकता टल गई है।
डॉक्टरों ने सलाह दी कि बच्चों में लगातार उल्टी होना, पीलिया, व्यवहार में बदलाव, अत्यधिक सुस्ती या चेतना में कमी जैसे लक्षणों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। एक्यूट लिवर फेलियर हेपेटाइटिस-ए जैसे संक्रमणों के अलावा कुछ जन्मजात लिवर रोगों के कारण भी हो सकता है, जिनमें कई मामलों में अंततः लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है। समय पर पहचान, शीघ्र चिकित्सा इंटरवेंशन और विशेषज्ञ क्रिटिकल केयर सुविधाओं तक पहुंच ऐसे मरीजों की जान बचाने और बेहतर परिणाम सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
