भूत-प्रेत की कहानियों से शुरू हुआ अंधविश्वास का जाल

बचपन में बड़े बुजुर्ग अक्सर भूतों से उनके साथ हुई घटनाओं के किस्से सुना महफ़िल लूट लिया करते थे, जिनमें उनका भूतों के साथ बीड़ी पीना आम बात थी और कई बार वो भूतों को हड़का भी देते थे, तब साथ वाले उनके साथी बुजुर्ग उनसे भी भयंकर वाला किस्सा सुनाते और यही सब सुनते सुनाते खौफ का माहौल पनप उठता था। परंतु इससे कहीं ना कहीं जो डर था, उस डर ने अन्धविश्वास और पाखंड का रूप ले लिया और लगने लगी लम्बी लाइनें मौलवी और बाबाओं के यहाँ और देखते दिखाते पाखंड का धंधा खूब चल निकला, बची हुई कसर टीवी, मोबाईल व इंटरनेट ने पूरी कर दी। अब इस समस्या से घरवाले व समाज दूर रख सकता था लेकिन वे भी कहीं ना कहीं इस महामारी की चपेट में आ चुके थे। इस बीच सबसे अधिक नुकसान किसी का हुआ तो मनोरोग से जूझ रहे लोगों का।

अक्सर जो लोग अपने आप से बातें करते हैं और उन्हें देखकर हम उन्हें पागल समझ लेते हैं। जिन लोगों को अजीब आवाजें सुनाई देती हैं, अजीब तरह का अहसास होता है, उनका पूरा व्यवहार अजीब होता है और बस इतना भर देखते ही परिवार वाले झाड़ फूँक, ताबीज, टूना, जादू और भी पता नहीं क्या क्या और उस व्यक्ति की बदनामी की कहानी अलग से मिर्च मसाले के साथ,
भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही भूत-प्रेत की कहानियों ने न केवल मनोरंजन का काम किया, बल्कि अनजाने में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति गलत धारणाओं को भी जन्म दिया है। बुजुर्गों की इन कहानियों ने समाज में एक ऐसा माहौल तैयार किया है जहाँ मानसिक रोगों को अक्सर अलौकिक शक्तियों से जोड़कर देखा गया। आधुनिक युग में टेलीविजन, मोबाइल और इंटरनेट ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है। बची हुई कसर भूत प्रेतों पर फ़िल्में बना लोगों के डर से फ़िल्म प्रोड्यूसरों व फ़िल्मी कलाकारों ने मोटी कमाई की। परिणामस्वरूप झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र और ताबीज़ों का धंधा फल-फूल रहा है, जबकि वास्तविक मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपेक्षा हो रही है। जब कोई व्यक्ति स्वयं से बात करता है, अजीब आवाज़ें सुनता है, या असामान्य व्यवहार प्रदर्शित करता है, तो समाज इसे तुरंत अलौकिक घटना मान लेता है। परंतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह शिज़ोफ्रेनिया जैसे मानसिक रोग के लक्षण हो सकते हैं। जोकि हर 100 में से 1 व्यक्ति को हो सकती है।

शिज़ोफ्रेनिया एक गंभीर मानसिक विकार है जो व्यक्ति की सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने की क्षमता को प्रभावित करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनियाभर में लगभग 2.4 करोड़ लोग इस रोग से पीड़ित हैं। भारत में भी इसकी व्यापकता 0.15% से 1.1% तक है। मनोवैज्ञानिक अनुसंधान बताते हैं कि शिज़ोफ्रेनिया के मुख्य कारणों में आनुवंशिक कारक (60-80% आनुवंशिकता), न्यूरोकैमिकल असंतुलन और पर्यावरणीय तनाव शामिल हैं। डोपामाइन और सेरोटोनिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर्स का असंतुलन इस रोग के मुख्य कारक हैं, न कि कोई अलौकिक शक्ति।

मानसिक रोगों का इलाज झाड़-फूंक से नहीं, बल्कि आधुनिक मनोचिकित्सा विज्ञान से होता है। मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और काउंसलर जैसे विशेषज्ञ इन समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान प्रदान करते हैं। एंटीसाइकोटिक दवाएं शिज़ोफ्रेनिया के लक्षणों को नियंत्रित करने में सहायक होती हैं। आधुनिक दवाएं अधिक प्रभावी और कम दुष्प्रभाव वाली हैं। संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (सीबीटी) और पारिवारिक चिकित्सा रोगी के जीवन की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार लाती है। व्यावसायिक प्रशिक्षण और सामाजिक कौशल विकास के माध्यम से रोगी को समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जा सकता है। मानसिक स्वास्थ्य के प्रतिj समाज का नज़रिया बदलना अत्यंत आवश्यक है। परिवार और समुदाय का सहयोग रोगी के ठीक होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कलंक और भेदभाव की भावना को समाप्त करना होगा। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार, भारत में 13.7% जनसंख्या किसी न किसी मानसिक विकार से प्रभावित है। परंतु इनमें से केवल 10-12% लोग ही उचित इलाज प्राप्त कर पाते हैं।

आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
मानसिक रोगों का आर्थिक बोझ भी महत्वपूर्ण है। अनुपचारित मानसिक रोग न केवल व्यक्ति और परिवार को प्रभावित करते हैं, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादकता को भी घटाते हैं। लैंसेट कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का वैश्विक आर्थिक नुकसान 16 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत को निम्नलिखित दिशाओं में कार्य करना होगा। स्कूली पाठ्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य की जानकारी शामिल करनी होगी। मीडिया को भी जिम्मेदार भूमिका निभानी होगी।
आज के वैज्ञानिक युग में भूत-प्रेत की कहानियों को छोड़कर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना समय की मांग है। शारीरिक स्वास्थ्य की तरह मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। समाज के हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह मानसिक रोगियों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाए और उन्हें उचित इलाज दिलाने में सहयोग करे। केवल जागरूकता और वैज्ञानिक सोच के माध्यम से ही हम एक स्वस्थ और समृद्ध समाज का निर्माण कर सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

लेखक प्रदीप दलाल प्रेक्टिशनर साइकोलॉजिस्ट, लंदन

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