ईरान युद्ध का एशिया-प्रशांत पर बड़ा असर: महंगाई, सप्लाई संकट और मंदी का खतरा बढ़ा

ईरान में 28 फरवरी से शुरू हुआ युद्ध एशिया-प्रशांत इलाके पर उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से और ज्यादा असर डाल रहा है। शुरुआत में लगा था कि तेल और गैस की कमी का असर धीरे-धीरे दिखेगा, लेकिन हकीकत में कई देशों की अर्थव्यवस्था और आम जिंदगी पर अचानक बड़ा झटका लगा है। कई विशेषज्ञ इसकी तुलना कोविड जैसे बड़े संकट से कर रहे हैं।

भले ही जल्द शांति समझौता हो जाए, लेकिन इस पूरे क्षेत्र पर इसका असर लंबे समय तक रहने वाला है। आने वाले महीनों में उड़ानें रद्द होने, खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने, फैक्ट्रियों के रुकने, सामान की सप्लाई में देरी और बाजारों में रोजमर्रा की चीजों की कमी देखने को मिल सकती है। इसमें प्लास्टिक बैग, इंस्टेंट नूडल्स, वैक्सीन, सिरिंज, लिपस्टिक, माइक्रोचिप और स्पोर्ट्सवियर जैसी चीजें भी शामिल हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मिडिल ईस्ट के रास्तों से व्यापार कुछ और हफ्तों तक बाधित रहा, तो कई देशों में हालात बिगड़ सकते हैं, अशांति फैल सकती है और मंदी आ सकती है। कई कंपनियां दिवालिया होने के कगार पर हैं और सरकारें महंगाई को काबू में रखने के लिए भारी कर्ज ले रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक, साल के अंत तक एशिया में लाखों लोग गरीबी में जा सकते हैं।

भारत से श्रीलंका तक आर्थिक संकट का खतरा

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के मुताबिक, दुनिया की अर्थव्यवस्था लगभग हर जगह धीमी हो रही है क्योंकि दुनिया के करीब 20% तेल की सप्लाई बाजार से बाहर हो गई है। मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल-गैस रुकने से पूरे एशिया की सप्लाई चेन हिल गई है।

एशिया-प्रशांत पर सबसे ज्यादा असर इसलिए पड़ा क्योंकि यह क्षेत्र मिडिल ईस्ट के तेल और गैस पर बहुत ज्यादा निर्भर है, यहां की अर्थव्यवस्था आपस में गहराई से जुड़ी है और पहले से ही ऊर्जा की मांग ज्यादा थी जबकि सप्लाई कम पड़ रही थी।

यहां तक कि अगर होर्मुज की समस्या कल ही ठीक भी हो जाए तो भी तेल और गैस की सप्लाई को पहले जैसे स्तर पर आने में सालों लग सकते हैं।

चीन जैसे अमीर देशों पर असर थोड़ा कम होगा क्योंकि उनके पास ज्यादा संसाधन हैं, लेकिन बाकी एशिया में हालात ज्यादा खराब हैं। कई देशों की असली स्थिति उतनी अच्छी नहीं है जितनी दिखाई जा रही है।

वियतनाम के किसान, भारत के मजदूर, श्रीलंका के होटल मालिक, फिलीपींस के ड्राइवर और हांगकांग-सिंगापुर के कारोबारी सबकी चिंता बढ़ी हुई है। कई सरकारें बाहर से शांत दिखने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन अंदर ही अंदर हालात संभालना मुश्किल हो रहा है। ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार ये तीनों बड़े सेक्टर एक साथ दबाव में हैं।

संकट में ट्रांसपोर्ट सेक्टर, सप्लाई खतरे में

ट्रांसपोर्ट सेक्टर में भारी संकट आ गया है। 28 फरवरी को युद्ध शुरू होते ही एशिया में ट्रक, जहाज और विमान प्रभावित होने लगे। मार्च में दुनिया भर में 92,000 से ज्यादा फ्लाइट्स कैंसिल हुईं, जो पहले के मुकाबले दोगुनी हैं, और इसका सबसे ज्यादा असर एशिया-प्रशांत में दिखा।

मिडिल ईस्ट के रास्ते उड़ान भरने वाली एयरलाइंस ने दुबई जैसे बड़े हब के लिए उड़ानें तुरंत रोक दीं। जेट फ्यूल की कीमत लगभग दोगुनी हो गई और सप्लाई भी खतरे में पड़ गई, जिससे एयरलाइंस ने कई रूट बंद कर दिए। क्वांटस, एयर न्यूजीलैंड, लायन एयर, वियेटजेट, एयरएशिया, एयर इंडिया और कैथे पैसिफिक जैसी कई कंपनियों ने सेवाएं कम की हैं। मलेशिया की बाटिक एयर ने तो 35% उड़ानें घटा दीं ताकि दिवालिया होने से बच सके।

विशेषज्ञों के मुताबिक, एशिया-प्रशांत में हवाई ट्रैफिक एक तिहाई तक गिर चुका है। छोटी एयरलाइंस हर हफ्ते करोड़ों का नुकसान झेल रही हैं और कई बंद होने की कगार पर हैं। यहां तक कि कोविड के समय भी इतनी अनिश्चितता नहीं थी जितनी अब है।

इसका असर दूरदराज इलाकों पर भी पड़ा है, जहां अब पहुंचना और मुश्किल हो गया है। ट्रैवल एजेंसी, होटल और रेस्टोरेंट का कारोबार अचानक गिर गया है। श्रीलंका में एक होटल मालिक के मुताबिक, टिकट के दाम तीन गुना हो गए हैं और होटल की बुकिंग 80-90% तक गिर गई है।

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