सेंटर फॉर साइट में नई तकनीक शुरू, बिना फ्लैप बनाए नजर सुधारने की प्रक्रिया भी होगी उपलब्ध
फरीदाबाद। आंखों की बीमारियों के इलाज और चश्मे से छुटकारा पाने के लिए अब फरीदाबाद में आधुनिक लेजर तकनीक की सुविधा मिलेगी। सेंटर फॉर साइट फरीदाबाद में स्विट्जरलैंड में विकसित फेम्टो एलडीवी जेड-8 तकनीक की शुरुआत की गई है। इसके साथ ही फरीदाबाद में पहली बार इस तकनीक के माध्यम से लेजर आधारित मोतियाबिंद सर्जरी और बिना फ्लैप बनाए चश्मे का नंबर कम करने वाली क्लियर प्रक्रिया का विकल्प उपलब्ध होगा। मोतियाबिंद होने पर आंख का प्राकृतिक लेंस धुंधला हो जाता है, जिससे देखने में परेशानी होती है। ऑपरेशन के दौरान इस लेंस को हटाकर उसकी जगह कृत्रिम लेंस लगाया जाता है। नई लेजर तकनीक की मदद से ऑपरेशन के दौरान आंख पर सटीक चीरा लगाने, लेंस के आगे की झिल्ली को गोल आकार में खोलने और धुंधले लेंस को छोटे हिस्सों में बांटने जैसे काम किए जा सकते हैं। इससे डॉक्टर को ऑपरेशन के महत्वपूर्ण चरणों में अधिक सटीकता के साथ काम करने में मदद मिलती है। सेंटर फॉर साइट ग्रुप ऑफ आई हॉस्पिटल्स के चेयरमैन एवं मेडिकल डायरेक्टर प्रो. (डॉ.) महिपाल एस. सचदेव ने कहा कि दुनिया में निकट दृष्टिदोष यानी पास की चीजें साफ और दूर की चीजें धुंधली दिखाई देने की समस्या बढ़ रही है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक दुनिया की लगभग आधी आबादी मायोपिया से प्रभावित हो सकती है।
ऐसे में आधुनिक तकनीक और बेहतर नेत्र उपचार की सुविधाएं लोगों के नजदीक उपलब्ध कराना जरूरी है। फरीदाबाद में नई तकनीक की शुरुआत इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सेंटर फॉर साइट ग्रुप ऑफ आई हॉस्पिटल्स के सीईओ शंकर नारंग ने कहा कि हमारा उद्देश्य बड़े शहरों के साथ-साथ अन्य शहरों में भी आंखों के बेहतर इलाज की सुविधा पहुंचाना है। फरीदाबाद में नई लेजर तकनीक की शुरुआत इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे मरीजों को मोतियाबिंद के ऑपरेशन और बिना चीरा लगाए नजर सुधारने की आधुनिक सुविधा मिलेगी। हमारा प्रयास है कि अनुभवी डॉक्टरों और नई तकनीक की मदद से लोगों को बेहतर इलाज मिल सके। सेंटर फॉर साइट फरीदाबाद की मोतियाबिंद एवं दृष्टि सुधार विशेषज्ञ डॉ. स्मिता कपूर ने बताया कि क्लियर आंखों का नंबर कम करने की एक आधुनिक लेजर प्रक्रिया है। इसमें आंख के सामने मौजूद पारदर्शी हिस्से यानी कॉर्निया के अंदर एक छोटा-सा ऊतक तैयार किया जाता है। इसे एक छोटे चीरे से बाहर निकाल दिया जाता है। इससे कॉर्निया का आकार बदलता है और रोशनी आंख के अंदर सही तरीके से केंद्रित होने में मदद मिलती है। इस प्रक्रिया से निकट दृष्टिदोष और दृष्टिवैषम्य जैसी समस्याओं को ठीक करने में मदद मिल सकती है।
इसमें आंख पर अलग से फ्लैप यानी पतली परत बनाकर उठाने की जरूरत नहीं होती। हालांकि, यह प्रक्रिया हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं होती। इसके लिए आंखों की पूरी जांच जरूरी है। सेंटर फॉर साइट के मोतियाबिंद, ग्लूकोमा और रेटिना विशेषज्ञ डॉ. सुजय चौहान ने बताया कि नई तकनीक की मदद से मोतियाबिंद के ऑपरेशन के दौरान कई महत्वपूर्ण काम लेजर से किए जा सकते हैं। ऑपरेशन के बाद आंख में लगाए जाने वाले कृत्रिम लेंस का चयन भी मरीज की जरूरत के अनुसार किया जाता है। कुछ मरीजों के लिए ऐसे लेंस उपलब्ध हैं, जो अलग-अलग दूरी पर देखने में मदद कर सकते हैं, जबकि कुछ लेंस आंखों के विशेष प्रकार के नंबर को ठीक करने में सहायक होते हैं। कौन-सा लेंस बेहतर रहेगा, इसका निर्णय डॉक्टर जांच के बाद करते हैं। सेंटर फॉर साइट फरीदाबाद की मोतियाबिंद विशेषज्ञ डॉ. शायली गुप्ता ने कहा कि इस तकनीक की शुरुआत से फरीदाबाद और आसपास के मरीजों को आधुनिक लेजर आधारित मोतियाबिंद सर्जरी और बिना फ्लैप के चश्मे का नंबर कम करने की प्रक्रिया के अतिरिक्त विकल्प मिलेंगे।
